झारखंड सरकार को छात्रों के प्रति संवेदनशील रुख अपनाना चाहिए। कांग्रेस जैसे उसके सहयोगी दलों पर भी ये जिम्मेदारी है कि वे अलग मिसाल पेश करें, ताकि विपक्ष-पक्ष का फर्क (अगर है, तो) जाहिर हो सके।
‘कॉकरोच’ आंदोलन से केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनौतियां खड़ी हुईं, जिसमें विपक्षी दलों ने अपना फायदा देखा हो, तो वह लाजिमी ही है। लेकिन इन दलों को यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि युवा आक्रोश राजनीतिक दायरे में बंधा हुआ नहीं है। इसकी जड़ें बढ़ती गई अवसरहीनता, जवाबदेही का अभाव और शासकीय असंवेदनशीलता से बने दमघोंटू माहौल में छिपी हैं। इसलिए जिन राज्यों में गैर-भाजपा सरकारें हैं, और वहां ऐसे मुद्दे उठते हैं, तो वहां की सरकारों को उत्तरदायी और सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाना चाहिए। मगर झारखंड के छात्र- नौजवानों की शिकायत है कि हेमंत सोरेन उनकी मांगों के प्रति असहनशील बनी हुई है। रांची में 29 जुलाई से सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों का प्रदर्शन जारी है।
महीने भर पहले झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की 14वीं प्रारंभिक परीक्षा का रिज़ल्ट आने के बाद से यह विवाद शुरू हुआ। इस परीक्षा में गड़बड़ियों का आरोप है। साथ ही झारखंड संयुक्त असैनिक सेवा प्रतियोगिता परीक्षा-2025 की प्रारंभिक परीक्षा में भी धांधली के आरोप लगे हैं। जेपीएससी परीक्षा कांड में कई लोग गिरफ़्तार हुए हैं, लेकिन छात्रों की मांग है कि ये परीक्षा रद्द की जानी चाहिए। छात्र संगठनों ने परीक्षा धांधली की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग भी की है। इसके अलावा वो तमाम शिकायतें भी उभर कर सामने आई हैं, जिनकी चर्चा ‘कॉकरोच’ आंदोलन के दौरान हुई।
मसलन, छात्रों की शिकायत है कि झारखंड में भर्ती परीक्षाएं नियमित रूप से नहीं होतीं। कई बार परीक्षाओं को पिछले साल की भर्ती से जोड़ दिया जाता है, जिसका असर उम्मीदवारों की उम्र सीमा पर असर पड़ता है। भाजपा शासित राज्यों में ऐसी शिकायतों के प्रति बेरहम रुख देखने को मिला है। वैसा ही नजरिया गैर-भाजपा सरकारें भी अपनाती हैं, तो युवा आक्रोश के केंद्र में पूरा राजनीतिक तबका आ सकता है। इसलिए झारखंड सरकार को छात्रों के प्रति अधिक संवेदनशील नजरिया अपनाना चाहिए। कांग्रेस जैसे उसके सहयोगी दलों पर भी ये जिम्मेदारी है कि वे झारखंड में अलग मिसाल कायम करें, ताकि विपक्ष और पक्ष का फर्क (अगर है, तो) जाहिर हो सके।
