लूला की जीत से लैटिन अमेरिका में ‘डोनरो डॉक्ट्राइन’ लागू करने के अमेरिकी राष्ट्रपति के मंसूबे पर पानी फिर गया है। आरोप है कि लूला को हराने में ट्रंप समर्थकों ने पूरा जोर लगा रखा था।
ब्राजील में तमाम चुनाव-पूर्व अनुमानों को धता बताते हुए लुइज इनासियो लुला दा सिल्वा का फिर से राष्ट्रपति चुन लिया जाना दूरगामी वैश्विक महत्त्व की घटना है। तीन हफ्ते पहले प्रथम चरण के चुनाव में लूला धुर- दक्षिणपंथी उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सोनारो से दो प्रतिशत वोट से पिछड़ गए थे। उसी रोज हुए संसदीय एवं प्रांतीय चुनावों में भी धुर-दक्षिणपंथी समूह को बड़ी जीत मिली थी। उसके मद्देनजर दूसरे चरण में लूला की जीत की संभावनाएं धूमिल थीं। लेकिन तीन हफ्तों में असाधारण चुनाव अभियान चला कर 80 वर्षीय लूला ने श्रमिक, मूलवासी, और प्रगतिशील तबकों की अभूतपूर्ण गोलबंदी की।
उसका परिणाम उनकी जीत है, जिससे पूरे लैटिन अमेरिका में ‘डोनरो डॉक्ट्राइन’ लागू करने के अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के मंसूबे पर पानी फिर गया है। ट्रंप प्रशासन ने अपनी ‘सुरक्षा नीति’ में लैटिन अमेरिका में अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती-विहीन बनाने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। इसमें उसे काफी सफलता मिली है। वहां एक के बाद दूसरे देश में ट्रंपवादी धुर-दक्षिणपंथी सरकारें हाल में सत्ता में आई हैं। अपवाद सिर्फ ब्राजील और मेक्सिको हैं। इसीलिए ब्राजील का चुनाव बेहद अहम हो गया था। गुजरे हफ्तों में ऐसी खबरें आईं कि पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे फ्लेवियो के समर्थन में अमेरिका की बड़ी तकनीक कंपनियों ने अपनी पूरी ताकत लगाई है।
खासकर मेटा के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर बोल्सोनारो समर्थक सामग्रियों को खूब प्रसारित करने और लूला समर्थक सामग्रियों को प्रतिबंधित करने के आरोप लगे। ब्राजील का अभिजात्य वर्ग भी बोल्सोनारो के पक्ष में लामबंद था। चुनाव के दिन इल्जाम लगे कि कई राज्यों के दक्षिणपंथी नेताओं ने जानबूझ कर परिवहन सेवाओं में कटौती की। इतनी कि ऐन वक्त पर अदालत को मतदान का समय दो घंटे बढ़ाने का निर्णय देना पड़ा। यानी प्रतिकूल परिस्थितियों में लूला की संघर्ष भावना की जीत हुई है। इससे ब्रिक्स+ राहत की सांस लेगा। अंदेशा था कि बोल्सोनारो जीतते, तो विकासशील देशों के इस संगठन को कमजोर करने के ट्रंप के एजेंडे को आगे बढ़ाते। साथ ही लूला की जीत से उदारपंथी समूह उत्साहित होंगे, जो दुनिया भर में इस समय धुर-दक्षिणपंथ के आक्रामक तेवर के निशाने पर हैं।
