मुंह मोड़ लेने से वो ठोस हकीकतें नहीं बदल जाएंगी, जिस कारण देश में अशांति का माहौल बना है। अतः बेहतर यह होगा कि सत्ता पक्ष आंदोलनकारियों से संवाद बनाते हुए उनका भरोसा हासिल करे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विजय दशमी पर जो कहा, उसका सार है कि भारत के खिलाफ कोई बड़ी साजिश रची गई है। उन्होंने कहा कि कुछ “दानवी शक्तियां” भारत, हिंदुओं, और आरएसएस को विघटित करने की कोशिश में हैं। फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल, बांग्लादेश आदि में हुई घटनाओं का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि इनके पीछे जो शक्तियां मौजूद रही हैं, उनके निशाने पर भारत भी है। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन अंदाजा लगाया गया है कि उनके निशाने पर ‘कॉकरोच’ आंदोलन से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन थे।
इसी अवसर पर प्रधानमंत्री ने भी “देश के शत्रुओं” की बात की। नरेंद्र मोदी ने उन लोगों या ताकतों को “देश का दुश्मन” बताया, जो “देश के सम्मान को नुकसान पहुंचाते हैं, समाज को बांटते हैं और भारतीय संस्कृति से घृणा करते हैं।” स्पष्टतः संघ प्रमुख और प्रधानमंत्री दोनों इस समय विभिन्न जन समूहों- खासकर नौजवानों के जाहिर हो रहे असंतोष को वैध असहमति या विरोध प्रदर्शन के रूप में नहीं देखते। वे इसे ‘भारत के विकास’ के खिलाफ किसी षड्यंत्र का हिस्सा मानते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि सरकार ने विरोध प्रदर्शनों के प्रति दमनकारी तरीके क्यों अपना रखे है। यह रुख इस हद तक है कि संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार विशेषज्ञों की एक टीम ने ‘निहत्थे छात्रों के खिलाफ’ बल प्रयोग को ‘परेशान करने वाली कार्रवाई’ बताया है।
संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद के इस बयान में हाल में सात हजार से ज्यादा नौजवानों, पत्रकारों, वकीलों, राजनीतिक दलों एवं अन्य संगठनों के सदस्यों को हिरासत में लिए जाने और उनके फोन से प्रतिरोध संबंधी सामग्रियां डिलीट किए जाने की कथित “चिंताजनक” घटनाओं का जिक्र किया गया है। जाहिर है, सत्ता पक्ष जो तस्वीर पेश करना चाहता है, उसके अपने दायरे के बाहर उसकी कहीं सहज स्वीकृति नहीं है। उसे समझना चाहिए कि मुंह मोड़ लेने से वो ठोस हकीकतें नहीं बदल जाएंगी, जिस कारण देश में अशांति का माहौल बना हुआ है। अतः बेहतर नजरिया यह होगा कि सरकार आंदोलनकारियों से संवाद बनाते हुए उनका भरोसा हासिल करे।
