Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

कॉरपोरेट कल्चर का सवाल

New Delhi, Feb 19 (ANI): Tata Group Chairman N. Chandrasekaran speaks during the Opening Ceremony of India AI Impact Summit 2026 at Bharat Mandapam, in New Delhi on Thursday. (DD News/ANI Video Grab)

टाटा परिवार आम चलन को तोड़ कर बाहर के व्यक्ति को चेयरमैन बनाने की उदारता तो दिखाता है, लेकिन उसे स्वतंत्र निर्णय नहीं लेने देता। यानी वह मालिक होने की पारंपरिक मानसिकता से उबर नहीं पाता।

एन. चंद्रशेखरन के चेयरमैन पद छोड़ने से टाटा ग्रुप में जारी विवाद पर विराम जरूर लग गया है, लेकिन यह प्रकरण इस कंपनी समूह की संचालन प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न छोड़ गया है। चंद्रशेखरन इस सदी में टाटा परिवार के बाहर से आए टाटा संस के दूसरे चेयरमैन थे। ऐसे अन्य चेयरमैन साइरस मिस्त्री को विवादों के कारण उनके पद से हटा दिया गया था। उस घटनाक्रम को चंद्रशेखरन मामले से जोड़ कर देखें, तो प्रश्न उठता है कि क्या टाटा परिवार से बाहर से आए अधिकारियों से यह ग्रुप अलग अपेक्षाएं रखता है? क्या यह मान्यता है कि ऐसे व्यक्ति भले सबसे ऊंचे पद पर हों, लेकिन वे निर्णय टाटा परिवार के मनमाफिक ही लें? समझा जाता है कि एयर इंडिया के प्रबंधन, टाटा समूह के डिजिटल एवं ई-कॉमर्स उद्यमों से संबंधित नीति, साइबर सुरक्षा उपायों, और जैगुआर/ लैंड रोवर परियोजनाओं के संचालन पर टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा के साथ चंद्रशेखरन के मतभेद गहराए, जिससे नोएल ने उनकी दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव रोक दिया।

इसके पहले मिस्त्री ने कंपनी की कई परियोजनाओं को लेकर दीर्घकालिक नजरिया अपनाया, जिससे फौरी घाटे को वे नजरअंदाज कर रहे थे। समझा जाता है कि इससे रतन टाटा नाराज हो गए, जिसके परिणामस्वरूप 2016 में मिस्त्री को उनके पद से हटा दिया गया। लगभग वैसी ही घटना चंद्रशेखरन के साथ दोहराई गई है, हालांकि औपचारिक तौर पर उन्होंने नए कार्यकाल के लिए खुद के उपलब्ध ना होने की घोषणा की है। बहरहाल, यह गौरतलब है कि टाटा संस के निदेशक मंडल का बहुमत उन्हें एक और कार्यकाल देने के पक्ष में था, जिसे एक तरह से नोएल टाटा ने वीटो कर दिया। इस बात का परोक्ष उल्लेख चंद्रशेखरन ने अपने त्यागपत्र में भी किया है। तो कुल सूरत यह उभरती है कि टाटा परिवार भारत के आम चलन को तोड़ कर अपने से बाहर के व्यक्ति को चेयरमैन जैसा पद देने की उदारता तो दिखाता है, लेकिन उसे स्वतंत्र निर्णय नहीं लेने देता। यानी वह मालिक होने की पारंपरिक मानसिकता से उबर नहीं पाता। नतीजतन, चेयरमैन के स्वतंत्र निर्णय टकराव का कारण बन जाते हैं।

Exit mobile version