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सहमतियों का बिखराव

ByNI Editorial,
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भारत जैसे बहुलतापूर्ण और विशाल देश को केंद्र से आदेश के जरिए चलाने की सोच विभिन्नता में एकता की तलाश को कमजोर कर रही है। अगर हर क्षेत्र, समुदाय और वर्ग के लोगों देश की परिकल्पना विभाजित होने लगे, तो यह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा।

किसी राष्ट्र में लोकतंत्र आम सहमति से चलता है। शिक्षा अगर देश के अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों अलग ज्ञान और विश्व दृष्टि देने लगे, तो एक दीर्घकालिक टकराव की जमीन तैयार होने लगती है। अपने देश में फिलहाल ऐसा ही होता दिख रहा है। ताजा मिसाल कर्नाटक सरकार का नई शिक्षा नीति से खुद को अलग कर अपने राज्य के लिए अलग पाठ्यक्रम तैयार करने का फैसला है। ऐसा निर्णय पहले केरल और तमिलनाडु की सरकारें भी ले चुकी हैं। हाल में एनसीईआरटी ने जिन पाठ और अध्यायों को पाठ्यक्रम हटाया, केरल की सरकार ने उन्हें वापस अपने राज्य के स्कूलों में शामिल कर लिया है। उधर तमिलनाडु में नई शिक्षा नीति के साथ-साथ मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए होने वाले नेशनल इलिजिबिलिटी एंड एंट्रेंस टेस्ट के खिलाफ वहां की सरकार के साथ-साथ राजनीतिक दलों ने अभी अपने अभियान को अब आंदोलन में बदल दिया है। इसके अलावा भाषा का प्रश्न भी दक्षिणी राज्यों में फिर से सियासी मुद्दा बनता दिख रहा है। हाल में दंड संहिताओं को बदलने के लिए पेश विधेयकों को लेकर यह सवाल और गरमाया है। 

सार यह है कि भारत में अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर आम सहमति बिखर रही है। भारत जैसे बहुलतापूर्ण और विशाल देश को केंद्र से आदेश के जरिए चलाने की सोच विभिन्नता में एकता की तलाश को कमजोर कर रही है। अगर हर क्षेत्र, समुदाय और वर्ग के लोगों देश की परिकल्पना विभाजित होने लगे, तो भविष्य के लिए उसे एक खतरनाक संकेत ही माना जाएगा। अगर ऐसी सोच लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान सुझाने में नाकाम हो, तो फिर जोखिम और बढ़ जाता है। यह बात भी ध्यान में रखने की है कि ऐसी समस्याओं का समाधान एकतरफा ढंग से या अपनी सोच थोपते हुए नहीं निकाला जा सकता। संवाद के जरिए सहमति की तलाश ही एकमात्र सही विकल्प है। अगर इस बात को समझा जाए, तो सहमतियों के बिखराव को अभी भी रोका जा सकता है। भारतीय संविधान अपने-आप में मतभेदों के बीच अधिकतम सहमति ढूंढने की एक उत्कृष्ट मिसाल है। इस भावना को अविलंब पुनर्जीवित करने की जरूरत है।

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