सत्ता के ऊपरी हलकों तक शायद यह संदेश पहुंचा है कि दमन के तरीके का उलटा परिणाम हो सकता है। इसलिए अब युवाओं के प्रति संवेदनशील होने का संकेत दिया जा रहा है। यह स्वागतयोग्य है।
कॉकरोच आंदोलन के तहत युवाओं की लामबंदी का सत्ता प्रतिष्ठान पर कितना प्रभाव हुआ है, इसकी झलक सोमवार को सामने आई। 20 जुलाई को संसद मार्च में शामिल नौजवानों पर हुए मुकदमों को वापस लेने के मामले में केंद्र पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए कॉकरोच जनता पार्टी ने पांच सितंबर को दिल्ली में फिर मार्च आयोजित करने का एलान किया है। दिल्ली पुलिस ने संकेत दिया था कि ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन की जारी तैयारियों के कारण इस कार्यक्रम को इजाजत देना कठिन होगा। यही दलील देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई कि शिखर सम्मेलन से एक हफ्ता पहले इस आंदोलन से कानून- व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है, अतः इस पर रोक लगाई जाए।
मगर चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने अर्जी ठुकरा दी। कहा कि फिलहाल ऐसा मानने का कोई ठोस आधार नहीं है कि युवाओं के मार्च से कानून- व्यवस्था की स्थिति बिगड़ेगी। कोर्ट ने कहा कि कानून- व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है और कोर्ट भरोसा है कि सरकार कानून के दायरे में रहकर यह काम करेगी। हाल- फिलहाल में जनतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में कोर्ट का ऐसा दो-टूक रुख कभी-कभार ही देखने को मिला है। बहरहाल, कोर्ट का यह रुख सामने आने के बाद जो हुआ, वह और भी महत्त्वपूर्ण है। दिल्ली पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका देकर गुजारिश की कि वह अनुच्छेद 142 के तहत संविधान से मिले विशेष अधिकार का इस्तेमाल कर कॉकरोच आंदोलन के दौरान दर्ज सभी प्राथमिकियों को रद्द कर दे।
कोर्ट ने इस याचिका पर सकारात्मक रुख दिखाया। यह घटनाक्रम युवाओं की उभरी शक्ति की मिसाल है। गुजरे महीनों में जिस पैमाने पर छात्र- युवा असंतोष सड़कों पर दिखा है, उसने यह भ्रम तोड़ दिया है कि सरकारी मशीनरी के अत्यधिक उपयोग से असहमति और प्रतिरोध को हमेशा के लिए दबाए रखा जा सकता है। सत्ता के ऊपरी हलकों तक संभवतः यह संदेश पहुंचा है कि दमन के तरीके का संभवतः उलटा परिणाम होगा। इसलिए अब युवाओं के प्रति संवेदनशील होने का संकेत दिया जा रहा है। यह स्वागतयोग्य है।
