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राजसत्ता अब ठेंगे पर?

अब इम्तहान राज्य एवं केंद्र सरकारों का है। क्या वे साबित करेंगी कि अनुबंधों में शामिल शर्तों का कुछ अर्थ होता है? अथवा, ऐसी शर्तों को ठेंगे पर रखने की प्रवृत्ति बढ़ाने में वे सहायक बनेंगी?

केरल के विझिंजम इंटरनेशनल पोर्ट को लेकर उठा विवाद इस बात की मिसाल है कि भारत में एकाधिकारी पूंजीपति अब किस हद तक राजसत्ता को अपनी मुट्ठी में मानने लगे हैं। घटनाक्रम अपने-आप में सारी कहानी बता देता है। विझिंजम अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह का निर्माण अडानी समूह ने किया। कुछ रोज पहले खबर आई कि इस ग्रुप ने इस बंदरगाह में अपनी 49 प्रतिशत हिस्सेदारी (लगभग 12,000 करोड़ रुपये में) स्विट्जरलैंड की मेडिटेरिनियन शिपिंग कंपनी को बेच दी है। इस पर केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन ने अचरज जताया।

कहा कि अडानी समूह ने राज्य सरकार को बिना सूचित किए इस बड़े सौदे की सार्वजनिक घोषणा कर दी है। जबकि अडानी समूह को परियोजना का निर्माण कार्य इस शर्त पर सौंपा गया था कि 25 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सेदारी बेचने के लिए उसे राज्य सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होगी। गौरतलब है कि बंदरगाह का स्वामित्व सरकार के पास है। केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन (जिनके कार्यकाल में बंदरगाह बना) ने भी पुष्टि की है कि अनुबंध में उपरोक्त शर्त शामिल है। केरल सरकार का कहना है कि विझिंजम एक रणनीतिक बंदरगाह है। एक ही विदेशी शिपिंग कंपनी को इतनी बड़ी हिस्सेदारी देने से प्रतिस्पर्धा खत्म होने का खतरा है। इससे सुरक्षा संबंधी पहलू भी जुड़े हैं। अतः इतनी बड़ी हिस्सेदारी बेचने से पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय एवं जहाजरानी मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी लेना भी आवश्यक है।

इस मुद्दे पर विवाद बढ़ने के बाद बंदरगाह निर्माता कंपनी- अडानी पोर्ट्स ने दावा किया कि अनुबंध से संबंधित किसी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है। हिस्सेदारी ट्रांसफर की प्रक्रिया को अंतिम मंजूरी के लिए अब सरकार के पास भेजा गया है। मगर इससे यह साफ हो जाता है कि अडानी ग्रुप आश्वस्त है कि सरकार की मंजूरी उसे मिलनी ही है! यह प्रक्रिया महज रस्म-अदायगी है, जिसे पहले नहीं, तो बाद में पूरा किया जाएगा! बहरहाल, अब इम्तहान राज्य एवं केंद्र सरकारों का है। क्या वे साबित करेंगी कि अनुबंधों में शामिल होने वाली शर्तों का कुछ अर्थ होता है? अथवा, ऐसी शर्तों को ठेंगे पर रखने की प्रवृत्ति बढ़ाने में वे सहायक बनेंगी?

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