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चीन- रूस की धुरी

रूस के चीन के करीब जाने से यूरेशिया का शक्ति संतुलन बदल रहा है। इससे नए समीकरण बनने की संभावना है। इसका प्रभाव पूरे क्षेत्र पर हो सकता है। दुनिया भर में विदेश नीति के कर्ता-धर्ताओं को इस स्थिति को अब अवश्य ध्यान में रखना होगा।

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की इस हफ्ते हुई चीन यात्रा ने दोनों देशों के रिश्तों में नया आयाम जुड़ने का ठोस संकेत दिया है। अब तक दोनों देशों की “असीम भागीदारी” में कम-से-कम घोषित तौर पर सुरक्षा का पहलू शामिल नहीं था। लेकिन लावरोव और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने अपनी वार्ता के बाद बेलाग अमेरिका और उसके साथी देशों पर ‘वर्चस्ववाद और डराने-धमकाने’ का आरोप लगाया। दोनों ने उसका मिल कर मुकाबला करने का इरादा भी जाहिर किया।

लावरोव ने कहा- ‘अगर मैं आपसे यह कहूं तो यह कोई गोपनीय सूचना नहीं होगी कि वांग यी ने मेरे सामने दोहरी जवाबी कार्रवाई से दोहरे प्रतिरोध का फॉर्मूला रखा।’ वांग ने कहा कि रूस और चीन को मिल कर शीत युद्ध की (पश्चिम की) मानसिकता, वर्चस्व और धमकियों से पार पाना होगा। उन्होंने कहा- ‘चीन और रूस को दुनिया में बहु-ध्रुवीयता को बढ़ावा देना चाहिए, कुछ देशों के एकाधिकार का विरोध करना चाहिए, और वैश्विक संबंधों का लोकतंत्रीकरण करना चाहिए।’

लावरोव ने एलान किया कि इस वर्ष रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ दो शिखर वार्ताएं होंगी। दोनों पहले जून में कजाखस्तान में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के दौरान मिलेंगे, और फिर अक्टूबर में दोनों के बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समय मुलाकात होगी। वैसे चर्चा यह भी है कि इसी वर्ष पुतिन चीन की यात्रा भी कर सकते हैँ। जाहिर है, दोनों देशों में मौजूदा विश्व समीकरणों के बीच समान हित की भावना पैदा हुई है।

अपने साथ ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों को भी जोडृने की दिशा में वे आगे बढ़े हैं। जाहिर है, इस घटनाक्रम पर सारी दुनिया की नज़र रहेगी। स्पष्टतः ये धुरी पश्चिमी नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था के खिलाफ उभर रही है, जिसका पिछले साढ़े दशक में दुनिया पर एकछत्र प्रभाव रहा है। रूस के चीन के करीब जाने से यूरेशिया का पूरा शक्ति संतुलन बदल रहा है। इसका प्रभाव पूरे क्षेत्र पर हो सकता है। दुनिया भर विदेश नीति के कर्ता-धर्ताओं को इस उभरती स्थिति को अवश्य ध्यान में रखना होगा।

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