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संभल में जो हुआ

Masjid Survey

जब तक उपासना स्थल अधिनियम अस्तित्व में है, हर पूजा स्थल की 15 अगस्त 1947 को जो स्थिति थी, उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। वह कानून अस्तित्व में रहे, और उसका खुलेआम उल्लंघन भी हो, यह कतई उचित नहीं है।

उत्तर प्रदेश के संभल में प्रशासन की जो भूमिका रही, उसे कानून के राज और न्याय भावना की कसौटियों पर सिरे से अनुचित माना जाएगा। पहली बात, जब तक उपासना स्थल अधिनियम अस्तित्व में है, हर पूजा स्थल की 15 अगस्त 1947 को जो स्थिति थी, उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। वह कानून अस्तित्व में रहे, और उसका खुलेआम उल्लंघन भी होता रहे, तो यही कहा जाएगा कि देश में कानून और संविधान का कोई मूल्य नहीं रह गया है। ना ही सुप्रीम कोर्ट की इस भावना की कोई कदर होती दिख रही है कि अयोध्या विवाद के हल होने के बाद अब मंदिर-मस्जिद के झगड़े खत्म हो जाने चाहिए।

फिर भी पूजा स्थलों के स्थिति में परिवर्तन करना अगर सत्ता पक्ष का एजेंडा है, तो उसे पहले संसद से इस अधिनियम को रद्द करवा देना चाहिए! जहां तक संभल की बात है, तो वहां कोर्ट ने बिना दूसरे पक्ष को सुने एक मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया। कोई याचिका आई थी, तो क्या उचित नहीं होता कि अदालत पहले दूसरे संबंधित पक्ष को नोटिस जारी कर उसका जवाब मांगती? फिर प्रशासन ने इतना उत्साह दिखाया कि कोर्ट का आदेश आने के कुछ घंटों के अंदर ही सर्वे शुरू कर दिया। हैरतअंगेज है कि एक सर्वे होने के बाद फिर दूसरे सर्वे के लिए टीम गई। उसी समय पुलिस और दूसरे पक्ष की भीड़ में टकराव हुआ। तब फायरिंग में चार लोग मारे गए।

सत्ताधारी नेताओं के सामने सवाल है कि वे भारत को कहां ले जाना चाहते हैं? क्या वे देश को सतत सांप्रदायिक उथल-पुथल में धकेल देना चाहते हैं? भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपना मातृ संगठन मानती है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 2022 में कहा था कि हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग ढूंढने की प्रवृत्ति छोड़ी जानी चाहिए। भाजपा इस पर भी गौर करती, तो उसकी सरकारें पूजा स्थलों को लेकर नए-नए विवाद खड़ा करने की फैलती जा रही प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए कारगर कदम उठातीं। लेकिन धारणा इसके उलट बनती जा रही है। इस पर पार्टी नेतृत्व को अविलंब आत्म-निरीक्षण करना चाहिए।

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