स्टार्ट-अप रिसर्च फर्म ट्रैकसन के मुताबिक एआई में निवेश की लगी होड़ के कारण विदेशी निवेशकों का रुख अमेरिका की ओर मुड़ा। नतीजतन, कम-से-कम 10 भारतीय स्टार्ट-अप्स अपना यूनिकॉर्न का दर्जा गंवा चुके हैं।
भारत में कम से कम 10 स्टार्ट-अप्स 2024 के बाद से अपना यूनिकॉर्न दर्जा गंवा चुके हैं। यूनिकॉर्न उन नई टेक कंपनियों को कहा जाता है, जिनका बाजार मूल्य एक बिलियन डॉलर से अधिक हो जाता है। कोरोना काल में भारतीय स्टार्ट-अप्स विदेशी निवेशकों के आकर्षण का केंद्र बने। नतीजतन, 2020-21 के बाद से तकरीबन 100 भारतीय स्टार्ट-अप्स को यूनिकॉर्न का दर्जा मिला। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ योजना की कामयाबी बताया गया। लेकिन 2024 से कहानी पलटनी शुरू हो गई। स्टार्ट-अप रिसर्च एवं एनालिटिक्स फर्म ट्रैकसन के मुताबिक आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) में निवेश की लगी होड़ के कारण विदेशी निवेशकों का रुख अमेरिका की ओर मुड़ा। उधर अमेरिकी बॉन्ड्स पर ब्याज दरें भी बढ़ीं, जिनसे वहां निवेश करने में ज्यादा फायदा नजर आने लगा।
इस बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर भी तमाम तरह की नकारात्मक चर्चाएं चलीं। तो कहा जा रहा है कि निवेशक अब “कहानी” के बजाय कारोबार की ठोस संख्याओं (मुनाफा) को देख रहे हैं। यानी धारणा बनी है कि भारतीय स्टार्ट-अप्स ने उज्ज्वल भविष्य की कहानियां निवेशकों को बेची थीं, जिनमें अब निवेशकों का भरोसा घट गया है। यह दीगर है कि निवेशकों का अभी जो आकर्षण केंद्र है, वह भी फिलहाल रेत की जमीन पर ही टिका है। अंतरराष्ट्रीय वित्त क्षेत्र में एआई में हुए अनियंत्रित निवेश को बाजार का बबूला मानने वालों की तदाद तेजी से बढ़ रही है। अमेरिका में मुद्रास्फीति में इजाफे के साथ ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना मजबूत हुई है।
उधर अमेरिका सरकार पर 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज चढ़ चुका है, इसलिए उसके बॉन्ड भी अब ऊंची ब्याज दर पर बिक रहे हैं। इससे बाजार में उपलब्ध नकदी के सिकुड़ने की आशंका है। कहा गया है कि हर बड़ा मार्केट बबल तब फटा, जब मुख्य कंपनियों के लिए उधार लेने की लागत (यानी ब्याज दर) तेजी से बढ़ी। यह सवाल चर्चा में है कि क्या एआई बूम का भी वही हाल होने जा रहा है? गौरतलब है कि चाहे स्टार्ट-अप बूम हो या एआई, दोनों की बुनियाद हवाई उम्मीदें रही हैं। ऐसी कथाओं का अक्सर निराशाजनक अंत होता है।
