जिस देश में कार स्वामित्व कुल आबादी में आठ प्रतिशत से नीचे हो, वहां कार मालिकों को इतनी बड़ी सब्सिडी देना सिरे से काबिल-ए-एतराज है। इससे बेहतर नजरिया डीजल/ पेट्रोल कार रखना महंगा बनाना होता।
दिल्ली सरकार की नई इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) नीति सही दिशा में पहल है। राष्ट्रीय राजधानी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिहाज यह लाभदायक हो सकती है। लेकिन इस नीति का बोझ आम करदाताओं पर डालने पर नजरिया आपत्तिजनक है। उपभोक्ताओं को इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर आकर्षित करने के लिए 30 लाख रुपये तक की कारों पर रोड टैक्स और पंजीकरण शुल्क में सौ फीसदी छूट दी गई है। साथ ही प्रदूषणकारी वाहनों को हटाने के लिए बीएस-4 या उससे पुराने चार पहिया वाहनों के लिए एक लाख रुपये तक का स्क्रैपेज इंसेंटिव दिया जाएगा। अगले चार वर्ष में दिल्ली सरकार 15,000 करोड़ रुपये ऐसी सब्सिडी और ईवी के चार्जिंग स्थल बनाने आदि पर खर्च करेगी।
स्पष्टतः राजकोष से खर्च होने वाला ये पैसा उन नागरिकों की कीमत पर होगा, जो कार रखने का सपना भी नहीं देख पाते। जिस देश में कार स्वामित्व कुल आबादी में आठ प्रतिशत से नीचे हो, वहां कार मालिकों को ऐसी सब्सिडी देना सिरे से काबिल-ए-एतराज है। इससे बेहतर नजरिया डीजल/ पेट्रोल कार रखना महंगा बनाना होता। यह फैसला लिया जा सकता था कि ऐसी कार रखने वालों को ईवी की तुलना में दो या तीन गुना अधिक रोड टैक्स और पंजीकरण शुल्क देना होगा। सार्वजनिक स्थलों पर वैसे वाहनों का पार्किंग शुल्क भी दो या तीन गुना ज्यादा किया जा सकता था। भारत में कार रखने वाले तबकों के लिए यह खर्च कोई बड़ा बोझ नहीं है।
उस स्थिति में इस जरूरी पहल का बोझ राजकोष पर नहीं पड़ता। बल्कि सरकार अतिरिक्त राजस्व जुटा सकती थी, जिसे सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था को दुरुस्त करने पर खर्च किया जा सकता था। लेकिन अब अंदेशा है कि सार्वजनिक कल्याण और गरीब तबकों को बुनियादी सुविधाएं देने के लिए रखे जाने वाले बजट पर ईवी को प्राथमिकता देने के निर्णय की मार पड़ेगी। दिल्ली सरकार ने एक जनवरी 2027 से दिल्ली में केवल इलेक्ट्रिक थ्री-ह्विलर्स (ई-ऑटो) का पंजीकरण करने और एक अप्रैल 2028 से पेट्रोल-सीएनजी दोपहिया वाहनों का पंजीकरण पूरी तरह बंद कर केवल इलेक्ट्रिक मॉडल्स को अनुमति देने का फैसला किया है। ये कदम सही दिशा में हैं।
