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उदारीकरण का सार-संक्षेप

2001-20 में भारत में हुई कुल कारोबारी आय का 60 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ पांच घरानों के हाथ में गया। रिलायंस, अडानी, बिड़ला, जिंदल और टाटा- समूहों का अब कॉरपोरेट राजस्व पर असाधारण नियंत्रण है।

बीती चौथाई सदी (1991 से) में अपनाई गई आर्थिक नीतियों का सार है कि इनके परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था पर पांच बड़े औद्योगिक घरानों का वर्चस्व कायम हो गया है। 2001 से 2020 भारत में हुई कुल कारोबारी आय का 60 प्रतिशत हिस्सा उन्हीं पांच घरानों के हाथ में गया। उसके बाद ये रुझान और मजबूत ही हुआ है। चार अर्थशास्त्रियों द्वारा तैयार और वर्ल्ड बैंक इकोनॉमिक रिव्यू में प्रकाशित वर्किंग पेपर “बिजनेस ग्रुप्स, कंसंट्रेशन एंड मार्केट पावर इन इंडिया” के मुताबिक रिलायंस, अडानी, बिड़ला (आदित्य), ओपी जिंदल और टाटा- समूहों का कॉरपोरेट राजस्व और आर्थिक शक्ति पर असाधारण नियंत्रण बन चुका है।

अध्ययनकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि 1991 के बाद लाइसेंस राज खत्म होने, सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आर्थिक क्षेत्रों को आरक्षित रखने का चलन घटने, कंपनियों का अधिग्रहण एवं विलय आसान होने, व्यापार एवं विदेशी मुद्रा निवेश के लिए नियमों को आसान बनाए जाने, तथा नया प्रतिस्पर्धा अधिनियम अस्तित्व में आने से आरंभिक दिनों में उद्यमों के बीच प्रतिस्पर्धा तीव्र हुई। लेकिन पारिवार आधारित बड़े कारोबारी घराने जल्द ही अपने संपर्कों के जरिए अधिक लाभ उठा सकने की हैसियत में पहुंच गए। ‘राष्ट्रीय चैंपियन’ (बड़े घरानों को सरकारी प्राथमिकता देने) की नीति अपनाने के बाद (मुख्यतः नरेंद्र मोदी राज में) यह परिघटना और मजबूत हो गई।

2020 आते-आते शीर्ष 25 पारिवारिक व्यापार समूहों का राजस्व भारत की जीडीपी के 15 प्रतिशत से अधिक हो गया था। वैसे, 2010-11 की सबसे बड़े समूहों की रैंकिंग पर ध्यान दें, तो साफ होता है कि तब से इसमें बहुत कम बदलाव हुए हैँ। यह बाजार पर चंद घरानों के दीर्घकालिक वर्चस्व का उदाहरण है। वर्किंग पेपर के मुताबिक पहले अत्यधिक वर्चस्व रखने वाले सार्वजनिक/ सरकारी क्षेत्र के प्रभाव में सिकुड़न आने से आरंभ में समग्र बाजार संकेंद्रण घटा। लेकिन जल्द ही बड़े औद्योगिक घरानों ने ज्यादातर खुले नए क्षेत्रों में प्रवेश कर लिया। यह निष्कर्ष आम अनुभव और पहले हुए अध्ययनों के नतीजों के अनुरूप ही है। यह स्थिति बताती है कि क्यों भारतीय अर्थव्यवस्था तीव्र वृद्धि दर हासिल करने के बावजूद आम जन की बुनियादी आर्थिक जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही है।

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