भारत अपनी 30 फीसदी उर्वरक जरूरत के लिए आयात पर निर्भर है। मगर, कई उर्वरक जो देश में बनते हैं, उनकी इनपुट सामग्रियों पर ध्यान दें, ये तो निर्भरता 70 फीसदी तक बढ़ जाती है। क्या ये स्वस्थ स्थिति है?
अभी पिछले साल ही अमेरिका से व्यापार युद्ध के सिलसिले में जब चीन ने उर्वरकों का निर्यात रोका, तो उससे भारत भी गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था। उसके पहले 2022 में रूस- यूक्रेन की लड़ाई शुरू हुई, तब भी भारत को उर्वरक आपूर्ति की समस्या से जूझना पड़ा था। अब पश्चिम एशिया में जारी युद्ध से उससे भी बड़ी समस्या खड़ी होती दिख रही है। युद्ध के लंबा खिंचने के साथ देश में उर्वरकों की उपलब्धता की चिंता हर दिन अधिक गहराती जा रही है। ध्यान देने की बात है कि उर्वरकों का संबंध देश की खाद्य सुरक्षा से है। किसी भी देश की सर्वोच्च प्राथमिकता खाद्य के मामले में आत्म-निर्भरता होनी चाहिए।
लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज खेती-बाड़ी से जुड़ी अनिवार्य चीजों के मामले में भी भारत दूसरे देशों पर निर्भर बना हुआ है। मोटे आंकड़ों के मुताबिक भारत अपनी 30 फीसदी उर्वरक जरूरत के लिए आयात पर निर्भर है। मगर, कई उर्वरक जो देश में बनते हैं, उनकी इनपुट सामग्रियों पर ध्यान दिया जाए, ये तो निर्भरता 70 फीसदी तक बढ़ जाती है। क्या ये स्वस्थ स्थिति है? पिछले साल के आंकड़ों के मुताबिक इस मामले में भारत सबसे ज्यादा निर्भर रूस (18.1 प्रतिशत), सऊदी अरब (15.7), चीन (15) और मोरक्को (14.8 प्रतिशत) पर था। जॉर्डन, ओमान, कतर, यूएई और मिस्र अन्य देश हैं, जिनसे भारत उर्वरक के इनपुट आयात करता है।
फिलहाल पश्चिम एशिया वाले तमाम देशों से आयात कठिन हो गया है। वहां जारी युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन सामग्रियों की कीमत में भी भारी उछाल आया है। इसका बोझ सरकारी खजाने पर पड़ेगा। पिछले साल केंद्र ने उर्वरक सब्सिडी के तौर पर 1.87 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे। इस वर्ष इस मद में 1.71 लाख करोड़ रुपये रखे गए हैं। जाहिर है, वास्तविक खर्च इससे काफी ज्यादा होगा। बहरहाल, मामला सिर्फ सब्सिडी बजट का नहीं है। मुद्दा है कि इस बारे में दीर्घकालिक योजना क्यों नहीं बनाई जाती? क्यों नहीं इनपुट के स्रोतों का विस्तार कर उर्वरक उत्पादन का कार्य अपने देश में किया जाता? आखिर अनाज से ज्यादा अहम और क्या है?
