खाद्य महंगाई बढ़ने से आम उपभोक्ताओं का बजट बिगड़ता है, उनकी क्रय शक्ति घटती है, और ग्रामीण आर्थिकी पर खराब असर पड़ता है। इस कारण आम उपभोग घटता है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होती है।
महंगाई की मार फिर तेजी से पड़ रही है। बीते महीने खुदरा मुद्रास्फीति दर में हुई बढ़ोतरी ने आम जन-जीवन और रसोई के बजट को प्रभावित किया है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो पिछले 23 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत दर्ज की गई थी। उसके बाद एक महीने में आई तेजी मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल का परिणाम है। खाद्य महंगाई दर 7.74 प्रतिशत हो गई है। विशेष रूप से सब्जियों और रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के दाम तेज गति से बढ़े हैं। प्याज की कीमतों में पिछले साल की तुलना में 100 प्रतिशत से अधिक की भारी बढ़ोतरी हुई है।
अदरक, लहसुन और कुछ अन्य खाद्य वस्तुएं भी काफी महंगी हुई हैं। नतीजतन आम नागरिकों की थाली का खर्च काफी बढ़ गया है। आंकड़ों के मुताबिक महंगाई का ये असर शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण इलाकों पर अधिक गहरा है। खाद्य महंगाई दर बढ़ने से आम उपभोक्ताओं का बजट बिगड़ता है, उनकी क्रय शक्ति कम होती है, और ग्रामीण अर्थशास्त्र पर खराब असर पड़ता है। इस कारण परिवार अपनी बुनियादी खाद्य जरूरतों पर अधिक खर्च करने के लिए मजबूर हो जाते हैं, जिससे स्वैच्छिक उपभोग के साथ- साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य जरूरी सेवाओं पर खर्च में कटौती करनी पड़ती है। उपभोग घटने का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
फिलहाल, स्वास्थ्य सेवाओं, परिवहन और रेस्तरां सेवाओं की कीमतें भी ऊंची बनी हुई हैं, जिससे उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर गहरा दबाव है। मुद्रास्फीति बढ़ने के रुझान को ध्यान में रखते हुए ही हाल में भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दर में इजाफा किया था। लेकिन उस कदम के पर्याप्त साबित होने की संभावना नहीं है। इसलिए कि वर्तमान महंगाई का एक प्रमुख कारण कच्चे तेल, उर्वरक, केमिकल्स तथा कई अन्य जरूरी वस्तुओं की पर्याप्त सप्लाई ना होना है। चूंकि ऐसी आपात स्थिति के लिए सरकार पहले से तैयार नहीं थी, इसलिए अब उसके हाथ में शायद ही कोई उपाय है। यानी लोगों को फिलहाल राहत नहीं मिलने वाली है।
