जब मूलभूत प्रश्न राजनीतिक दलों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं रहते और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं जन समस्याओं का समय पर समाधान नहीं कर पातीं, तो जाहिर है, लोगों को प्रतिरोध पर उतरना ही एकमात्र रास्ता नजर आता है।
सड़कों पर उतरे असंतोष की चपेट में आने वाला सबसे नया देश इंडोनेशिया बना है। इससे पहले फ्रांस से लेकर अर्जेंटीना और इटली से लेकर ट्यूनिशिया तक में छात्र और युवाओं ने सड़कों पर उतर कर वहां मौजूद हालात पर अपना विरोध जताया है। इस सिलसिले में यह वाजिब राय बनी है कि दुनिया के अलग-अलग कोनों से जन प्रदर्शनों और आंदोलनों की आ रही तस्वीरें दरअसल एक बड़े वैश्विक संकट और बढ़ते जा रहे युवा असंतोष की ओर इशारा करती हैं। यूरोप के समृद्ध देशों में भी बढ़ती महंगाई शिक्षा के गिरते स्तर से असंतुष्ट नौजवान सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं। लगभग हर जगह वे संस्थानों से निष्पक्षता, पारदर्शिता, और अपने लिए बेहतर भविष्य की मांग कर रहे हैं।
फ्रांस में स्कूलों की खराब स्थिति, बेल्जियम, ग्रीस और अर्जेंटीना में उच्च शिक्षा बजट में कटौती, और स्पेन एवं पुर्तगाल में मकान किराये में बेलगाम बढ़ोतरी ने नौजवानों में गुस्सा भड़काया है। अल्बानिया में छात्रों ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया है और शिक्षा सुधारों की मांग कर रहे हैं, जबकि ट्यूनिशिया में आर्थिक तंगी के साथ-साथ लोकतांत्रिक अधिकारों और सिकुड़ती गई स्वतंत्रताओं को लेकर गहरा आक्रोश है। इंडोनेशिया में महंगाई ने नौजवानों को सड़क पर आने के लिए विवश किया है। स्पष्ट है कि ये आंदोलन छिटपुट घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वर्तमान आर्थिक और संस्थागत ढांचों के प्रति नई पीढ़ी में गहराए अविश्वास का परिणाम हैं।
नव-उदारवाद के दौर में दुनिया भर में शिक्षा के व्यापारीकरण हुआ है, वहीं मकान, बिजली, और रोजगार के अवसर आदि युवाओं की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। जब मूलभूत प्रश्न राजनीतिक दलों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाते और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं लोगों की समस्याओं का समय पर समाधान नहीं कर पातीं, तो जाहिर है, लोगों को प्रतिरोध पर उतरना ही एकमात्र रास्ता नजर आता है। अतः आंसू गैस, वॉटर कैनन, या धर-पकड़ जैसे बल प्रयोग से जन आक्रोश को दबाने का तरीका अस्थायी रूप से ही कारगर हो सकता है। सत्ताधारियों ने यह बात नहीं समझी, तो वे अधिक बड़ी उथल-पुथल को आमंत्रित करेंगे। और यह बात हर देश पर लागू होती है!
