रिपोर्ट इस सोच चुनौती देती है कि स्टेशनों का आधुनिकीकरण बुनियादी यात्री सेवाओं की गारंटी कर देता है। जहां स्टेशनों को फिर से बनाया गया, उनमें से भी कई जगहों पर बुनियादी सुविधाओं की कमी है।
रेलवे स्टेशनों की दुर्दशा वैसे तो किसी से छिपी नहीं है, लेकिन अब उनकी बदहाली की विस्तृत तस्वीर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने भी सामने रखी है। गैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं एवं स्वच्छता के हाल पर केंद्रित यह रिपोर्ट सभी 16 रेलवे जोनों के 512 ऐसे स्टेशनों के ऑडिट पर आधारित है। सीएजी ने स्टेशनों का चयन यात्रियों की आवाजाही और वहां से होने वाली कमाई को ध्यान में रखते हुए किया। उसने रेलवे डेटा, यात्री शिकायतों, यात्री प्रतिक्रियाओं, और रेलवे अधिकारियों के साथ मिल कर किए गए निरीक्षणों के आधार पर निष्कर्ष निकाले। निष्कर्ष है कि 89 प्रतिशत से अधिक स्टेशनों पर एक या अधिक न्यूनतम आवश्यक सुविधाओं की कमी है। और समस्या केवल छोटे स्टेशनों पर ही नहीं, बल्कि बड़े, उच्च-राजस्व और अधिक यात्री आवाजाही वाले स्टेशनों पर भी उसी तरह मौजूद है।
समस्या हैः सुविधाओं का ना होना और जो सुविधाएं मौजूद हैं, उनकी नाकाफी क्षमता तथा उनका रखरखाव ठीक ना होना। रिपोर्ट के मुताबिक 188 स्टेशनों पर पेय जल के पर्याप्त नल उपलब्ध नहीं थे, जो रेल मंत्रालय के इस दावे का खंडन करता है कि ऐसी सुविधाएं प्रदान कर दी गई हैं। रिपोर्ट इस सोच चुनौती देती है कि स्टेशनों का आधुनिकीकरण खुद ही बुनियादी यात्री सेवाओं की गारंटी कर देता है। यहां तक कि जहां स्टेशनों को फिर से बनाया गया है और जिन्हें बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर वाले स्टेशन समझा जाता है, उनमें से भी कई जगहों पर यात्रियों को पानी, पंखे, बैठने की जगह, शौचालय, और स्वच्छता की कमी आदि का सामना करना पड़ रहा है।
सार है कि भारतीय रेलवे के पास मानदंड, फंड और निगरानी के ढांचे तो मौजूद हैं, लेकिन उनके जरिए अमल असमान बना हुआ है। कारण जवाबदेही के सिस्टम का अभाव है। इस कारण सुविधाओं को मानदंडों के अनुसार प्रदान नहीं किया जाता, कार्यों के पूरा होने में देर होती है, मौजूद सुविधाओं का रखरखाव नहीं किया जाता, और कमियों को समयबद्ध कार्य योजनाओं के जरिए दूर नहीं किया जाता है। और इन सबको लेते हुए ही भारत “विकसित” होने की अपनी यात्रा पर आगे बढ़ रहा है!
