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बजट का सीधा गणित

केंद्रीय आमदनी में कॉरपोरेट टैक्स का हिस्सा 18 फीसदी ही रह गया है, जबकि आम लोगों का कर योगदान 46 फीसदी पहुंच गया है। यह प्रतिगामी सूरत है। बजट से साफ है कि इसमें सुधार का कोई प्रयास नहीं किया गया है।

केंद्रीय बजट में 2026-27 में 53,47,315 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसका 24 फीसदी हिस्सा कर्ज लेकर जुटाया जाएगा। बाकी रकम टैक्स और गैर कर स्रोतों से आएगी। सरकार जो खर्च करेगी, उसका 20 प्रतिशत हिस्सा पहले से मौजूद कर्ज का ब्याज चुकाने में जाएगा। 22 प्रतिशत हिस्सा उगाहे गए कर में राज्यों का हिस्सा देने, 11 प्रतिशत हिस्सा रक्षा, और दो प्रतिशत केंद्रीय कर्मचारियों के पेंशन पर खर्च हो जाएगा। इसके अलावा केंद्र के अपने प्रशासनिक खर्चे हैं। उन सबके बाद पूंजीगत निवेश के लिए लगभग 17 करोड़ (सवा 12 लाख करोड़ सीधे पूंजीगत निवेश और सवा पांच करोड़ पूंजीगत संपत्तियों के निर्माण के लिए सहायता अनुदान) के लिए बचेंगे। अगले वित्त वर्ष में केंद्र लगभग 17 लाख करोड़ रुपये के नए कर्ज लेगा।

मगर इससे भी प्रस्तावित खर्च पूरा नहीं होगा। कुल मिलाकर 4.3 प्रतिशत का राजकोषीय घाटा रह जाएगा। ये रविवार को पेश हुए आम बजट का सीधा गणित है। जब सरकार का लगभग एक चौथाई बजट कर चुकाने पर खर्च होने लगा है, तो समझा जा सकता है कि देश की वास्तविक आर्थिक स्थिति क्या है। पिछले साल केंद्र ने 14 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लिया। इस वर्ष उससे तीन लाख करोड़ रुपये अधिक लेने का इरादा उसने रखा है, तो उसकी वजह यही है कि अब ऋण चुकाने के लिए ऋण लेना पड़ रहा है। चालू वित्त वर्ष में केंद्र ने आय कर और जीएसटी दरों में छूट देकर अपने लिए प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों करों से होने वाले आय को घटाया। नतीजतन, उसे और अधिक ऋण लेना पड़ेगा। सरकार चाहती, तो कॉरपोरेट टैक्स में 2019 में दी गई छूट वापस लेकर तथा धनी लोगों पर नए कर लगाकर राजकोषीय सेहत सुधार सकती थी। अब उसकी कुल आमदनी में कॉरपोरेट टैक्स का हिस्सा 18 फीसदी ही रह गया है, जबकि (व्यक्तिगत आयकर 21 प्रतिशत, जीएसटी 15 प्रतिशत, उत्पाद एवं कस्टम 10 प्रतिशत मिला दें, तो) आम लोगों का कर योगदान 46 फीसदी तक पहुंच गया है। यह प्रतिगामी सूरत है। मगर इसे सुधारने के बजाय सरकार और ऋण लेकर वर्तमान एंव भावी पीढ़ियों पर बोझ बढ़ा रही है।

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