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पटरी पर है एमओयू

वार्ता में ठोस उपलब्धियां हासिल होना संकेत है कि ट्रंप प्रशासन 39 दिन के युद्ध से बदले शक्ति संतुलन को स्वीकार कर चुका है और अपने बनाए मकड़जाल से निकलने के लिए व्यग्र है।

शांति समझौते के लिए सहमति-पत्र (एमओयू) पर दस्तखत के बाद स्विट्जरलैंड में अमेरिका- ईरान की हुई पहली आमने-सामने वार्ता में ठोस प्रगति हुई। वार्ता के दौरान सार्वजनिक रूप से जो तेवर दोनों पक्षों ने दिखाए, उससे शुरुआती धारणा बनी कि वार्ता प्रक्रिया फिर अविश्वास का शिकार हो गई है। मगर अब यह साफ है कि वह सिर्फ अपने- अपने देशों में कठोर रुख रखने वाले जनमत को भरमाने के लिए था। इसी मकसद से डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमला करने और होरमुज जलडमरूमध्य पर जबरन कब्जा कर लेने की अचानक धमकी दी। उधर इसको बहाना बना कर ईरानी प्रतिनिधिमंडल वार्ता बीच में छोड़कर चला गया।

मगर उसके बाद भी मध्यस्थों (पाकिस्तान और कतर) के जरिए दोनों पक्षों में संवाद बना रहा, जिस दौरान महत्त्वपूर्ण सहमतियां हुईं। इनमें सबसे अहम टकराव नियंत्रण यूनिट का गठन है, जो लेबनान सहित पूरे मध्य-पूर्व में लड़ाई रुकवाने के लिए सक्रिय रहेगी। उसके अलावा ईरान एक हॉटलाइन बनाएगा, जिसके जरिए होरमुज जलमार्ग में पेश आने वाली किसी समस्या पर ईरानी अधिकारियों से संपर्क किया जाएगा। फिर परमाणु मुद्दे को हल करने के लिए कार्यदल बनाया गया, लेकिन यह तब सक्रिय होगा, जब अमेरिका एमओयू के तहत किए गए अपने वादों को पूरा कर देगा। कतर में ईरान की जब्त संपत्ति को लौटाने के मुद्दे पर समझौता हुआ, जिसके तहत संपत्ति का कुछ हिस्सा ईरान को लौटा भी दिया गया है।

उधर अमेरिका ने ईरान के तेल, गैस और पेट्रो-केमिकल्स के निर्यात पर से प्रतिबंध हटाने का निर्णय लिया है। गौर करें, तो ये सहमतियां साफ तौर पर ईरान के पक्ष में झुकी नजर आती हैं। संभवतः इससे ही ध्यान हटाने के लिए ट्रंप ने उग्र बयान दिया, जिस पर ईरान में संभावित प्रतिकूल प्रतिक्रिया के मद्देनजर ईरानी प्रतिनिधियों ने वॉक आउट का दिखावा किया। इन सबके बावजूद वार्ता में ठोस उपलब्धियां हासिल होना इस बात का संकेत है कि ट्रंप प्रशासन फरवरी- अप्रैल के दौरान 39 दिन के युद्ध से बदले शक्ति संतुलन को स्वीकार कर चुका है। अपने बनाए मकड़जाल से निकलने के लिए वह व्यग्र है, जिसकी कीमत चुकाने का मन वह बना चुका है।

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