जैसे आज राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मजबूत देशों ने ताक पर रख दिया है, वैसे ही युद्ध संबंधी तमाम वर्जनाएं टूट रही हैं। यह सभ्यता की ओर मानव समाज की आगे बढ़ी यात्रा की दिशा का पलट जाना है।
अमेरिका और इजराइल ने बिना विकिरण जैसे परिणामों की चिंता किए ईरान के परमाणु ठिकाने नांतेज पर बमबारी की। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल के परमाणु स्थल डिमोना पर मिसाइलें दागीं। दोनों हमलों में काफी नुकसान होने की खबरें हैं। इसके बाद डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के बिजली ग्रिड को तबाह करने की धमकी दी, तो जवाब में ईरान ने कहा कि ऐसा होने पर वह इजराइल और खाड़ी देशों में ना सिर्फ बिजली, बल्कि जल स्वच्छ करने के संयंत्रों पर भी निशाना साधेगा। इससे भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति सांकेतिक भाषा में जो कहा, उसका यही अर्थ समझा गया है कि उन्होंने ईरान पर परमाणु बम गिराने की धमकी दी है।
दूसरे विश्व युद्ध में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम से हुई तबाही देखने के बाद दुनिया में धारणा बनी थी कि मानव विवेक आगे कभी ऐसा नहीं होने देगा। वैसे, उस महायुद्ध के बाद दुनिया में युद्ध संबंधी नियम- कायदे भी बने। उनके मुताबिक नागरिक स्थलों, बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं, स्कूल- अस्पताल आदि जैसी जगहों को सैन्य हमलों से दूर रखने पर सहमति बनी। मगर, आज ये सारी बातें जमींदोज हो गई लगती हैं। ईरान पर हमलों की शुरुआत होते ही अमेरिका- इजराइल ने मिनाब में छोटी बच्चियों के स्कूल पर हमला किया। उसके बाद से नागरिक स्थलों, अस्पतालों, ऊर्जा स्थलों एवं जल स्वच्छता केंद्रों पर निशाने साधे गए हैं।
ईरान ने भी उनका जवाब उसी अंदाज में दिया है। और ये सिलसिला बढ़ते- बढ़ते अब परमाणु हमले की चर्चा तक पहुंच गया है। इस क्रम में ये कयास भी लगाए गए हैँ कि ईरान ने खुद अपनी तैयारी से या किसी अन्य स्रोत से व्यापक विनाश के अस्त्र जुटाए हुए हैं, जिनका इस्तेमाल वह आगे चल कर सकता है। ये बातें यही बताती हैं कि जैसे आज राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मजबूत देशों ने ताक पर रख दिया है, वैसे ही युद्ध के संबंध में तमाम वर्जनाएं टूट रही हैं। यह सभ्यता की ओर मानव समाज की आगे बढ़ी यात्रा की दिशा का पलट जाना है। आधुनिक युग में ऐसा होगा, पहले ये सोचना असंभव था!
