अमेरिका में जजों के बहुमत ने महसूस किया कि कोई संवैधानिक व्यवस्था उस स्थिति में स्थिर ढंग से नहीं चल सकती, अगर गणराज्य की मूलभूत इकाई- नागरिक- की परिभाषा मनमाने ढंग से तय की जाती हो।
जिस समय भारत में नागरिकता के प्रमाण-पत्र को लेकर जानबूझकर अनिश्चय पैदा कर दिया गया है, अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने दृढ़ता का प्रशंसनीय उदाहरण पेश किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने नागरिकता के इस नियम को बदलने का प्रयास किया कि अमेरिकी भूमि पर जन्मा हर व्यक्ति वहां का नैसर्गिक नागरिक है। सुप्रीम कोर्ट ने अब ट्रंप के इस आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि नागरिकता की अवधारणा को डेढ़ सौ साल पहले संवैधानिक रूप से स्पष्ट कर दिया गया था, जिसे मनमाने ढंग से नहीं बदला जा सकता। हालांकि इस प्रश्न पर अमेरिका में उभरे तीखे राजनीतिक मतभेद और सामाजिक ध्रुवीकरण की छाया कोर्ट पर भी पड़ी। उसने 5-4 के बहुमत से ये फैसला सुनाया।
यानी चार जजों ने मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) आंदोलन के विदेशी विद्वेष से भरे एजेंडे के तहत लिए ट्रंप के निर्णय का पक्ष लिया। फिर भी इस निर्णय ने अमेरिकी न्यायपालिका में मौजूद स्वतंत्र चिंतन और संवैधानिक भावना के पक्ष में खड़े होने की भावना की पुष्टि की है। जजों के बहुमत ने महसूस किया कि कोई संवैधानिक व्यवस्था उस स्थिति में स्थिर ढंग से नहीं चल सकती, अगर गणराज्य की मूलभूत इकाई- नागरिक- की परिभाषा मनमाने ढंग से तय की जाती हो। इसलिए उसने 1868 में पारित 14वें संविधान की भावना के मुताबिक नागरिकता के नियमों में हेरफेर की कोशिश को नाकाम कर दिया है।
संयोगवश ये फैसला उस समय आया है, जब भारत में भी नागरिकता की निर्धारित परिपाटी को मनमाने नियमों के जरिए चुनौती दी गई है। पश्चिम बंगाल में मोदी सरकार के विरोधी रहे एक अंग्रेजी अखबार के पूर्व संपादक का पासपोर्ट वोटर लिस्ट में नाम ना होने के आधार पर रीन्यू ना करने की घटना ने ऐसे मनमाने में निहित खतरे को स्पष्ट कर दिया है। संबंधित व्यक्ति का वोटर लिस्ट से नाम एसआईआर के दौरान हटा, जिसके बारे में एक धारणा यह है कि ये पूरी प्रक्रिया मनमाने ढंग से अंजाम दी गई। क्या भारतीय न्यायपालिका से आज ये उम्मीद की जा सकती है कि वह नागरिकता के प्रश्न पर अमेरिकी कोर्ट जैसी दृढ़ता दिखाएगी?
