पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाने की नीति के गंभीर परिणाम सामने होने के बावजूद सरकार में इस नीति पर पुनर्विचार के संकेत नहीं हैं। जबकि उचित यह होगा कि वह इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न ना बनाए।
केंद्र के इस दावे पर यकीन करना कठिन है कि चीनी आयात के फैसले का पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट से कोई संबंध नहीं है। अभी हाल तक अच्छी फसल वाले साल में भारत 70 लाख टन तक चीनी का निर्यात करता था। अब दस लाख टन चीनी आयात करने की नौबत आई है। गणित सीधा है। खबरों के मुताबिक 28 फीसदी इथेनॉल का उत्पादन गन्ने से हो रहा है। अनुमान है कि जितना गन्ना इसमें लगा, उससे 30 लाख टन चीनी बन सकती थी। ऐसा होता, तो देश में मांग की तुलना लगभग 20 लाख टन अतिरिक्त चीनी उपलब्ध रहती।
इसलिए इस धारणा में दम है कि वाहनों में ईंधन के रूप इथेनॉल के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की गुमराह नीति विदेशी मुद्रा की किल्लत के दौर में चीनी जैसी सामान्य वस्तु के आयात के लिए जिम्मेदार है। लेकिन बात यहीं तक नहीं है। चावल जैसे आम अनाज का भी इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल बढ़ रहा है। खबरों के मुताबिक बीते अप्रैल-जुलाई के बीच भारतीय खाद्य निगम ने इस मकसद से 23.42 लाख टन चावल बेचा। वित्त वर्ष 2025-26 में इससे दो गुना चावल इसके लिए बेचा गया था। इस रुझान में किस तेजी से वृद्धि हुई है, इसे जानने के लिए इस पर गौर करना पर्याप्त होगा कि 2023-24 तक महज 8.96 लाख टन चावल का इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हुआ था। इस उद्देश्य के लिए मक्के का उपयोग भी बढ़ा है।
संभवतः ऐसी ही सूचनाओं से चिंतित होकार कुछ रोज पहले नरेंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागश्वेरन ने एक अखबार में लेख लिख कर अपनी चिंता जताई थी। उन्होंने इथेनॉल उत्पादन में बड़े पैमाने पर पानी के इस्तेमाल को लेकर भी आगाह किया था। तब तक चीनी आयात का फैसला सामने नहीं आया था। अब चूंकि इथेनॉल का यह परिणाम सामने है, तो बाकी चिंताएं भी अधिक गंभीर हो गई हैं। मगर सरकार के अंदर पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाने की नीति पर पुनर्विचार के संकेत नहीं हैं। जबकि उचित यह होगा कि बिना प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए वह तुरंत इस नीति में उचित बदलाव लाए।
