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डब्लूटीओ में सबसे अलग?

खबर है कि अफ्रीकी देशों के दबाव में दक्षिण अफ्रीका अपना रुख बदलने जा रहा है। उसने सचमुच रुख बदला, तो फिर प्रस्तावित निवेश सुगमीकरण एवं विकास समझौते के खिलाफ भारत के अलावा तुर्किये ही एक प्रमुख देश रह जाएगा।

अफ्रीकी देश कैमरून में गुरुवार से विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) की शुरू हो रही 14वीं मंत्री-स्तरीय बैठक में निवेश सुगमीकरण एवं विकास समझौता के मुद्दे पर भारत अल्पमत में पड़ता दिख रहा है। खबर है कि अफ्रीकी देशों के दबाव में दक्षिण अफ्रीका अपना रुख बदलने जा रहा है, जो हाल तक चीन के इस प्रस्ताव के खिलाफ एक प्रमुख आवाज था। उसने सचमुच रुख बदला, तो फिर प्रस्तावित समझौते के खिलाफ भारत के अलावा तुर्किये ही एक प्रमुख देश रह जाएगा। अमेरिका सहित जी-7 के सदस्य देश कुछ आपत्तियों के साथ इस प्रस्ताव को अपना समर्थन दे चुके हैँ। ब्रिटेन, जर्मनी, और फ्रांस इसके उत्साही समर्थक हैं, जबकि जापान अनमने ढंग से इसके पक्ष में चला गया है। कुल मिला कर 166 में से 128 देश समझौते को अपना समर्थन दे चुके हैं। डब्लूटीओ में फैसला सर्व-सम्मति से होता रहा है, लेकिन भारत सहित कई देशों के विरोध को देखते हुए चीन ने डब्लूटीओ के अंदर सहमत देशों के बीच समझौते का नया चलन शुरू करने की पेशकश की है। भारत अपने विरोध से ये कोशिश नाकाम कर सकता है, लेकिन उस अवस्था में उसके खासकर विकासशील एवं गरीब देशों के बीच अलोकप्रिय होने का जोखिम रहेगा। समझौते के समर्थकों का कहना है कि इससे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अधिक पारदर्शी एवं अनुमान-योग्य बनेगा, जिससे कम विकसित देशों को लाभ होगा।

एक अध्ययन के मुताबिक इस प्रस्ताव को लेकर जो विकासशील देश अधिक उत्साहित हैं, उनमें से ज्यादातर चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के सदस्य हैं। बहरहाल, पश्चिमी देशों को भी इस समझौते में अपने लिए लाभ नजर आया है। उनकी दलील है कि ये समझौता होने के बाद निवेशक विदेशों में किए गए अपने निवेश लेकर अधिक आश्वस्त रह सकेंगे। उधर अल्प- विकसित देशों का कहना है कि निवेश सुरक्षित होने का भरोसा होने पर विदेशी निवेशक उनके यहां अपना पैसा लगाने के लिए अधिक प्रेरित होंगे। तो कुल मिलाकर इस पहल के विरोधी कुछ मिडल पॉवर देश ही बचे हैं, मगर अब उनकी संख्या भी घटने के संकेत हैं। इसलिए तीन दिन की ये बैठक भारत के लिए चुनौती भरी होगी।

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