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हताशा का ये आलम

रूस में मारे गए नौजवानों में एक 23 वर्षीय हेमिल मनगुकिया थे। उनके पिता ने पुष्टि की है कि उनका परिवार रूस की नागरिकता लेने की तैयारी में है। क्यों? इस सवाल पर उन्होंने एक अखबार से कहा- ‘भारत में क्या रखा है?’

खबर सुर्खियों में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी मास्को यात्रा के दौरान उन भारतीय नौजवानों का मामला उठाया, जिन्हें रूस ले जाकर वहां यूक्रेन के खिलाफ लड़ाई में झोंक दिया गया। इस पर रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने उन नौजवानों को जल्द कार्य-मुक्ति देकर भारत लौटाने का आश्वासन दिया। लेकिन अब भारत में आई मीडिया रिपोर्टों से इस घटनाक्रम में एक नया पहलू जुड़ा है। खबर है कि रूस ने लड़ाई में मारे गए भारतीय नौजवानों को एक करोड़ 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया है। साथ ही उनके परिजनों को रूस की नागरिकता देने की पेशकश भी की गई है। गुजरात के एक परिवार ने तो रूस की नागरिकता लेने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। रूस में मारे गए नौजवानों में एक 23 वर्षीय हेमिल मनगुकिया थे। उनके पिता अश्विनभाई मनगुकिया ने पुष्टि की है कि उनका परिवार रूस की नागरिकता लेने की तैयारी में है। क्यों?

इस सवाल पर उन्होंने एक अखबार से कहा- ‘भारत में क्या रखा है?’ उनकी इस हताशा भरी टिप्पणी ने युद्धग्रस्त इजराइल जाने के लिए हरियाणा के एक कैंप में जुटी भीड़ में शामिल एक नौजवान की याद ताजा कर दी। उसने एक अखबार से कहा था कि ‘भारत में भूख से मरने से बेहतर इजराइल में कमाते हुए मरना है।’ और उन लोगों की यादें भी ताजा हुई हैं जो डंकी रूट (यानी अवैध तरीके) से अमेरिका पहुंचने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा रहे हैं। ये सभी लोग देश में फैलती अवसरहीनता के स्पष्ट उदाहरण हैं। मगर बात सिर्फ यहीं तक नहीं है। खुद सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर वर्ष हजारों करोड़पति भी भारतीय नागरिकता को अलविदा कह अपना ठिकाना कहीं और ढूंढ रहे हैं। क्या यह अनुमान लगाना गलत होगा कि ऐसे तमाम लोगों के मन में मनगुकिया जैसी ही सोच घर कर गई है कि ‘भारत में क्या रखा है?’ दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस सामूहिक मनोदशा पर सत्ता के हलकों में कोई चिंता नहीं है। उलटे इस सूरत पर परदा डालने के लिए वहां से ‘विकसित भारत’ और ‘अमृत काल’ जैसे जुमले लगातार उछाले जा रहे हैं।

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