बयानों की जवाबदेही तय होना जरूरी

भारत में नेताओं को कुछ भी बोलने की आजादी है। पहले आमतौर पर चुनावी सभाओं में नेता अनाप-शनाप बोलते थे। उन्हें इसकी छूट मिली थी। वे कुछ भी दावे करते थे, कुछ भी वादे करते थे और अपने विरोधियों को बदनाम करने के लिए कुछ भी आरोप लगाते थे। अब यह पूरे साल का काम हो गया है। वैसे तो अनाप-शनाप बोलने का यह वायरस पूरी दुनिया में फैल गया है तभी चार साल के अपने कार्यकाल में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 20 हजार से ज्यादा झूठ बोले। अब वहां का मीडिया ऐसा है, जिसने हर झूठ की गिनती की और उसे सार्वजनिक किया। भारत का मीडिया तो सत्ताधारी के हर झूठ पर वाहवाही करता है और उसे सच साबित करने के लिए आधे-अधूरे आंकड़े खोज कर लाता है। तभी अमेरिका में चार साल में ही झूठ के पांव उखड़ गए और उसके उलट भारत में मजबूत हो गए!

तभी अब समय आ गया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं के बयानों की जवाबदेही तय हो। पार्टी संगठन का काम करने वाले नेताओं से भी उम्मीद की जाती है कि उनका आचरण नैतिक हो और वे झूठ न बोलें। लेकिन फिर भी पार्टी की राजनीति में उन्हें आरोप-प्रत्यारोप करने होते हैं और इसलिए उनको जवाबदेही के दायरे से बाहर रखा जा सकता है। परंतु यह छूट संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को नहीं दी जा सकती है। क्योंकि सरकारी कार्यक्रमों से अलग भी उनकी कही बात कानून का दर्ज रखती है। अगर किसी राज्य का मुख्यमंत्री कोई दावा करता है या प्रधानमंत्री कोई बात कहते हैं तो वह कानून का दर्जा रखता है, बेशक वह बात राजनीतिक कार्यक्रम में कही गई हो। ऐसा नहीं हो सकता है प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक कार्यक्रम में कोई घोषणा करें और सरकारी तौर पर उस पर अमल करना जरूरी न समझें!

अफसोस की बात है कि भारत में इन दिनों ऐसा ही हो रहा है। संवैधानिक पदों पर बैठे नेता अनाप-शनाप बयान दे रहे हैं, झूठ वादे और दावे कर रहे हैं और अपनी विपक्षी पार्टियों पर झूठे आरोप लगा रहे हैं। उनके बयानों में न तो कोई नैतिकता रह गई है और न कोई जवाबदेही है। इसकी अनेक मिसालें दी जा सकती हैं। सबसे पहली मिसाल दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की है। इस समय देश में किसानों का आंदोलन चल रहा है। केंद्र सरकार के बनाए तीन कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन जब इन कानूनों को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिली और राष्ट्रपति ने इस पर दस्तखत कर दिए उसके बाद कम से कम एक कानून को दिल्ली सरकार ने लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी। लेकिन वे आज अपने को किसान आंदोलन का सबसे बड़ा रहनुमा साबित करने में लगे हैं। उन्होंने जो किया और जो कह रहे हैं क्या उसमें एकरूपता नहीं होनी चाहिए? इसी तरह उन्होंने एक बयान दिया कि दिल्ली में अमेरिका से ज्यादा कोरोना टेस्टिंग हो रही है। सोचें, अमेरिका से दिल्ली की तुलना की क्या तुक है? अमेरिका में 23 करोड़ टेस्ट हुए हैं और पूरे भारत में सिर्फ 16 करोड़! अगर दिल्ली की आबादी के लिहाज से भी देखें तो दिल्ली में 83 लाख टेस्टिंग हुई है यानी 60 फीसदी के करीब और अमेरिका 70 फीसदी से ज्यादा आबादी का टेस्ट कर चुका है। फिर भी बिना कुछ सोचे-विचारे मुख्यमंत्री ने यह बात कह दी।

ऐसे ही केंद्र सरकार के बनाए कृषि कानूनों में से एक कानून देश को एक बाजार बनाने वाला है। इसका सबसे ज्यादा प्रचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया और उनके कृषि मंत्री व पार्टी के दूसरे नेता भी इसका खूब प्रचार कर रहे हैं कि इससे किसानों को अनाज बेचने का विकल्प मिल रहा है। पूरा देश एक बाजार बन रहा है और किसान अपना अनाज कहीं भी बेच सकता है। इस अखिल भारतीय प्रचार के बीच मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि वे अपने यहां के किसानों का तो सारा अनाज खरीदेंगे लेकिन कोई बाहरी किसान अनाज बेचने आया तो ट्रैक्टर जब्त कर लिया जाएगा। उनके इस बयान पर कोई सफाई या खंडन नहीं आया। जाहिर है भारत में किसी के कुछ भी बोलने पर जवाबदेही की कोई नीति नहीं है इसलिए जिसकी राजनीति को जो बात सूट करती है वह बोलता है।

इसका एक कारण यह भी है कि प्रधानमंत्री खुद अपने मन में जो आता है वह बोलते हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि वह बात तथ्यात्मक रूप से सही है या नहीं या सैद्धांतिक रूप से नियमों के संगत है नहीं! इसी वजह से बाकी लोगों को भी छूट मिली हुई है कि वे जो मन में आए वह बोलें। जैसे पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने कृषि कानूनों के फायदे समझाते हुए कहा कि उनकी सरकार किसानों के हित के लिए प्रतिबद्ध है और तभी उसने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू की है। सवाल है कि सरकार ने जब स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू कर दी तो किसान फिर किस स्वामीनाथन फॉर्मूले को लागू करने की मांग कर रहे हैं? किसानों ने गुरुवार यानी 23 दिसंबर को भी सरकार को जो चिट्ठी भेजी उसमें लिखा कि स्वामीनाथन आयोग के फार्मूले को लागू किया जाए। अगर वह फार्मूला लागू हो गया है तो सरकार क्यों नहीं किसानों से यह बात कह रही है या लिख कर उनको भेज रही है कि उसने तो फार्मूला लागू कर दिया है। असल में स्वामीनाथन फार्मूले के मुताबिक अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय हो तो उसमें फसल की पैदावार पर आने वाली लागत यानी खाद, बीज, सिंचाई, बिजली आदि के खर्च के साथ साथ जमीन का किराया, मशीनरी का किराया या उसकी कीमत का हिसाब, किसान परिवार की मजदूरी और ऊपर से 50 फीसदी मुनाफा शामिल होगा। अगर सरकार ऐसा कर दे तो किसान क्यों मजदूर बन कर भटकेंगे?

इसी तरह पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री ने उद्योग समूह एसोचैम के कार्यक्रम में भारत को निवेश के लिए आकर्षक जगह बताते हुए कहा कि पहले दुनिया कहती थी कि ‘व्हाई इंडिया’ और अब कहती है ‘व्हाई नॉट इंडिया’। अब सवाल है कि दुनिया के किस देश ने कब और कहां यह बात कही, इसका कोई प्रमाण नहीं है। या पहले किस देश ने, किसके, कब और कहां कहा कि ‘व्हाई इंडिया’ इसका भी कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन यह बात अनुप्रास में है और जुमले के लिहाज से ठीक है तो बोल दिया। अगर सचमुच दुनिया में ‘व्हाई नॉट इंडिया’ का माहौल तो भारत में लोग बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश क्यों नहीं कर रहे हैं? अगर प्रधानमंत्री या सरकार दावा करते हैं कि भारत में कोरोना काल में बहुत भारी निवेश हुआ है तो साथ में यह क्यों नहीं बताते कि उस निवेश का एक-तिहाई मुकेश अंबानी की कंपनी जियो में आया है और अब मुकेश अंबानी के रिटेल कारोबार में जा रहा है!

इसी तरह कोरोना वायरस को रोकने के प्रयास को लेकर प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि दुनिया भारत की तारीफ कर रही है। असल में दुनिया में किसी को किसी की तारीफ करने की फुरसत नहीं है, सब अपने यहां कोरोना रोकने में जुटे हैं। न्यूजीलैंड सहित कई देशों कोरोना मुक्त हो गए लेकिन क्या प्रधानमंत्री ने उनकी तारीफ की है, जो एक करोड़ से ज्यादा केस हो जाने के बाद भी दावा कर रहे हैं कि दुनिया भारत की तारीफ कर रही है? उन्होंने 25 मार्च से देश में 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा करते हुए कहा था कि जैसे महाभारत की लड़ाई 18 दिन में जीती गई थी वैसे ही कोरोना के खिलाफ लड़ाई 21 दिन में जीत ली जाएगी। आज इस बात के ठीक नौ महीने हो गए और अब भी देश में 20 हजार से ज्यादा केस हर दिन आ रहे हैं। क्या प्रधानमंत्री को देश को गुमराह करने के लिए लोगों से माफी नहीं मांगनी चाहिए थी! लेकिन उसके बाद उन्होंने एक बार भी उस बयान का जिक्र नहीं किया। इसी तरह नोटबंदी के समय किए उनके कई दावों के वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हैं। जाहिर उन्होंने कुछ भी बोलने की नजीर बनाई है, जिसे उनकी पार्टी के नेता तो फॉलो करते ही हैं, साथ ही दूसरी कुछ पार्टियां भी उनके बताए रास्ते पर चलने लगी हैं। इसका अंत नतीजा यह होगा कि जिस तरह से लोगों का भरोसा पार्टियों और नेताओं से उठा है वैसे ही सरकार, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों से भी उठ जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares