सुधार के नाम पर संकट को न्योता

जैसे इस सरकार के सारे सुधारों के साथ हुआ है वैसा ही आगे होने जा रहे नए सुधारों के साथ भी होगा। सुधार के नाम पर किए गए लगभग सारे क्रांतिकारी काम अंततः नए संकटों का कारण बने। नोटबंदी से लेकर जीएसटी और सीएए से लेकर लॉकडाउन तक जितने क्रांतिकारी फैसले हुए, जिनको मास्टरस्ट्रोक कहा गया, सब तबाही और लोगों की परेशानी का कारण बने हैं। इसलिए संसद के मॉनसून सत्र में जो कानून बनाए जा रहे हैं और जिनको बड़ा क्रांतिकारी माना जा रहा है उनमें से भी ज्यादातर कानून आगे संकट का कारण बनने वाले हैं। इन कानूनों से देश के संघीय ढांचे को तो चुनौती मिल ही रही है पर साथ ही जिनके लिए यह कानून बनाया जा रहा है उनकी भी मुश्किलें बढ़ने वाली हैं।

सरकार ने कृषि से जुड़े तीन अध्यादेशों को कानून बनाने की प्रक्रिया पहले ही दिन शुरू कर दी। वैसे ये अध्यादेश के जरिए ही कानून बना दिए गए हैं सिर्फ संसद की मुहर लगाने के लिए पेश किया गया। इन कानूनों से किसानों की स्थिति सुधरने की बजाय और खराब होगी। सरकार एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी, एपीएमसी कानून को बदल रही है। इसके साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की पूरी पुरानी व्यवस्था खत्म हो जानी है। सरकार यह काम किसानों के हित के नाम पर कर रही है, लेकिन असलियत में यह बदलाव किसानों को पूरी तरह से बड़े कारोबारियों के हवाले कर देगा। इस बदलाव से छोटे आढ़तिए भी प्रभावित होंगे लेकिन यह किसानों के लिए खुश होने की बात नहीं होगी। क्योंकि उनकी किस्मत छोटे आढ़तियों के हाथ से निकल कर बड़े कारोबारियों के हाथ में पहुंच जाएगी।

जिस एपीएमसी कानून को बदला जा रहा है और किसानों का बड़ा हित करने का दावा किया जा रहा है, वह कानून जिन राज्यों में नहीं है वहां के किसान क्या बहुत खुशहाल हैं? बिहार में एपीएमसी नहीं है। वहां का किसान सरकारी खरीद से आजाद है तो क्या वह मध्य प्रदेश या पंजाब के किसान से ज्यादा खुशहाल है? सरकार किसान को सरकारी खरीद से आजाद करके उसका बड़ा भला करने का दावा कर रही है। पर असल में ऐसा नहीं है। असलियत में किसान बाजार की ताकतों के हवाले हो रहा है। अभी ही खबर आ रही है कि सरकार ने मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य 18 सौ रुपए प्रति क्विंटल से ज्यादा तय किया है लेकिन किसान इसे आठ सौ रुपए प्रति क्विंटल पर बेचने को मजबूर हैं।

भारत में बड़ी जोत वाले किसानों की संख्या बहुत कम है। भारत में औसत जोत डेढ़ एकड़ की है। इसमें खेती करने वाले किसान के पास इतने साधन नहीं होते हैं कि वह अपनी फसल को कोल्ड स्टोरेज में रख कर अच्छी कीमत मिलने का इंतजार करे। उनके पास इतने साधन भी नहीं होते हैं कि वे एक राज्य के दूसरे राज्य या एक जिले से दूसरे जिले में ले जाकर बेच सकें। इसलिए सरकार के इस दावे का भी कोई अर्थ नहीं है कि राज्यों की सीमाएं खोल कर वह किसानों का बड़ा भला कर रही है। इसके बावजूद ज्यादातर किसान अपने खेत तक पहुंचने वाले कारोबारी के हाथों ही अपनी फसल बेचेगी।

उलटे भारत सरकार जो कानून बनाने जा रही है उसमें किसान की हैसियत खेत मजदूर की होने जा रही है। सरकार जो कानून बनाने जा रही है उसमें मंडिया खत्म हो जाएंगी और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था खत्म हो जाएगी, क्योंकि इस कानून में एमएसपी के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। जब ऐसा हो जाएगा तो किसान को किसी तरह की सुरक्षा नहीं रह जाएगी। पहले यह व्यवस्था है कि किसान अपनी फसल किसी भी कारोबारी को बेच सकता है। आढ़तिए उसके पास आकर खेत में खड़ी फसल खरीद लेते हैं। खेत में फसल की बुवाई के समय ही किसान को कुछ पैसे मिल जाते हैं। लेकिन अब नए कानून के मुताबिक खरीददार फसल नहीं खरीदेगा, बल्कि किसान को उसकी सेवाओं की कीमत देगा। यानी खेत और फसल दोनों खरीददार की होगी और किसान सिर्फ मजदूर होगा, जिसे अपनी सेवाओं की कीमत मिलेगी। अगर कोई किसान इस व्यवस्था में नहीं आना चाहता है तब उसे कोई न्यूनतम सुरक्षा नहीं हासिल है क्योंकि मंडिया खत्म हो जाएंगी और एमएसपी भी खत्म हो जाएगी। इसलिए किसान को कारोबारी के तय किए दाम पर अपना सामान बेचना होगा।

जब सरकारी खरीद की व्यवस्था खत्म होगी तो उसके साथ ही खाद्य सुरक्षा की मौजूदा स्थिति भी धीरे धीरे खत्म होनी शुरू हो जाएगी। आज भारत के सरकार के खाद्यान्न के गोदाम भरे हुए हैं और कोरोना वायरस की महामारी आई तो सरकार ने इन गोदामों से निकाल कर अनाज लोगों को बांटने शुरू किए। बाढ़, सुखाड़ या सुनामी या किसी भी प्राकृतिक आपदा के समय सरकार अनाज बांटती है। जब वह खरीद कर अपने गोदाम नहीं भरेगी तो उसे निजी कंपनियों पर निर्भर रहना होगा, जो संकट के समय सरकार को अनाज देंगी या नहीं देंगी और देंगी तो क्या कीमत लेंगी, वह अभी नहीं कहा जा सकता है।

इसी तरह सरकार आवश्यक वस्तु अधिनियम को भी बदलने जा रही है। यह बदलाव भी आने वाले दिनों में भारत के नागरिकों के लिए बहुत बड़ी मुसीबत का कारण बन सकता है। यह जमाखोरी को बढ़ावा देने वाला कानून है। निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां बड़ी मात्रा में अनाज खरीद कर उनसे गोदाम भर सकती हैं। अगर सरकार का नियंत्रण इस पर नहीं रहेगा तो वह कालाबाजारी नहीं रोक पाएगी। बाजार की ताकतें किसी समय जरूरी वस्तुओं की किल्लत पैदा कर सकती हैं और मनमाने दाम वसूल सकती हैं। कृषि से जुड़े तीनों कानूनों के विरोध में देश के किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। हरियाणा की पिपली मंडी में किसानों ने प्रदर्शन किया तो पुलिस ने बर्बरता से लाठियां चलाईं। उत्तर प्रदेश से किसान संसद तक मार्च कर रहे थे तो उनको सीमा  पर रोक दिया गया। ऐसा लग रहा है कि सरकार कृषि के पूरे सेक्टर को बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में सौंपने की तैयारी कर चुकी है। उसे इस बात का भी ख्याल नहीं है कि कोरोना संकट की इस घड़ी में अगर अर्थव्यवस्था और नागरिकों की जान थोड़ी बहुत बची है तो खेती-किसानी के कारण ही बची है।

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