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बीसीसीआई के कायाकल्प की चुनौती

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के नए अध्यक्ष हो गए हैं। चुनाव की औपचारिक घोषणा 23 अक्तूबर को होनी है। बोर्ड के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी खिलाड़ी को इसकी कमान सौंपी गई है। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले वक्त में क्रिकेट और इससे जुड़े प्रशासनिक संगठनों की दशा सुधरेगी। गांगुली ने इसका संकेत देते हुए कहा भी है कि उनकी पहली प्राथमिकता बिखरी हुई बीसीसीआई को समेटने की होगी। पिछले तीन साल से बीसीसीआई की स्थिति अच्छी नहीं है और इसकी छवि काफी खराब है। बीसीसीआई हमेशा से सबसे ज्यादा धनी खेल संस्था रही है, इसलिए पर उद्योगपतियों और राजनेताओं का कब्जा बना रहा।
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि क्रिकेट ही नहीं, बल्कि सभी खेल की संस्थाओं पर राजनीतिकों और उद्योगपतियों का कब्जा रहा है। ऐसे में कैसे तो खेलों का विकास हो और कैसे खिलाड़ियों का उद्धार, यह बड़ा सवाल है। इसीलिए बीसीसीआई में सफाई और सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट तक को सख्त होना पड़ा और लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू करने के लिए आज भी जद्दोजहद चल रही है। ऐसे में अगर किसी खिलाड़ी और सफल कप्तान को बीसीसीआई की कमान सौंपी जाती है तो यह उम्मीद जरूर बंधती है कि वह इस संस्था को खेल और खिलाड़ियों के लिए ज्यादा बेहतर बना पाएंगे।
यह कोई छिपी बात नहीं है कि बीसीसीआई जैसी संस्थाएं एक तरह से सरकार की मुट्ठी में ही रहती हैं। जिस तरह से बीसीसीआई में गृहमंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह को सचिव जैसा महत्तवपूर्ण ओहदा देकर मुख्य भूमिका में रखा गया गया है, उसका संदेश और संकेत जगजाहिर है। गांगुली और जय शाह को बनवाने में वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर और पूर्व आईपीएल चेयरमैन ही केंद्रीय भूमिका में रहे। स्पष्ट है कि लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू भले हो जाएं और कुछ लोगों का कब्जा खत्म भी हो जाए, लेकिन घूम-फिर कर उस पर एक खास वर्ग अपने कब्जे का रास्ता हमेशा निकाले रखता है।
हालांकि अभी गांगुली का कार्यकाल दस महीने का ही है, लेकिन इस दौर में उनके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। उनके बारे में कहा भी जाता है कि वे हर तरह की चुनौतियों से मुकाबला करने में सक्षम हैं और इसके गुर उन्होंने अपने गुरु (स्वर्गीय) जगमोहन डालमिया से सीखे हैं। गांगुली को अब वे सारे काम करने हैं जो पिछले तैंतीस महीनों में प्रशासकों की समिति (सीओए) नहीं कर पाई है। गांगुली इशारा भी कर चुके हैं कि उनकी पहली प्राथमिकता प्रथम श्रेणी क्रिकेटरों की स्थिति सुधारने पर होगी, जिसकी लंबे समय से सीओए उपेक्षा करती आ रही है। दरअसल, इस वक्त बीसीसीआई में बड़े सुधारों की जरूरत है और यह काम कोई उद्योगपति, राजनेता या प्रशासक नहीं बल्कि खिलाड़ी ही ज्यादा बेहतर कर पाएगा। गांगुली को मौका मिला है कुछ कर दिखाने का, उन्हें अब अपनी क्षमताएं दिखानी होंगी।

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