भाजपा का अपने एजेंडे पर लौटना

तन्मय कुमार

भारतीय जनता पार्टी दूसरी बार सरकार में आने के बाद बुनियादी एजेंडे पर लौटी है। यह देश के लिए, राजनीति के लिए और खुद भाजपा के लिए कितने फायदे की बात है, इसका आकलन समय के साथ होगा पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले पूरे पांच साल भाजपा अपने कोर एजेंडे को भूली रही। 1980 में भाजपा के बनने के समय जो उसका एजेंडा तय किया गया था वह किसी न किसी रूप में उसके बाद हर चुनाव में पार्टी के घोषणापत्र में शामिल हुआ था। 2014 के चुनाव में भी ऐसे सारे मुद्दे घोषणापत्र में थे पर भाजपा पांच साल उसे भूली रही। भाजपा के अपने कट्टर समर्थक भी इस बात को लेकर परेशान थे। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देवालय से जरूरी शौचालय की बात की तो भाजपा समर्थकों को परेशानी हुई थी।

ध्यान रहे पहले कार्यकाल के पांच साल में भाजपा ने शौचालय बनवाने, स्वच्छता अभियान चलाने, जन धन खाते खोलने, मेक इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे अभियान चलाने पर ज्यादा ध्यान दिया। पर दूसरी बार जीतने के बाद उसने ऐसी कोई योजना शुरू नहीं की है। पुरानी योजनाओं को भी लगभग भूला दिया गया है। पिछली बार से ज्यादा बहुमत से केंद्र में लौटने के बाद सरकार जम्मू कश्मीर, अयोध्या, समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दे रही है। सरकार बनने के बाद पहले सत्र में अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला हुआ तो दूसरा सत्र शुरू होने से पहले ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर बनाने का आदेश दे दिया है। सरकार ने समान नागरिक संहिता की दिशा में भी ठोस कदम बढ़ा दिया है। सो, ऐसा लग रहा है कि इस बार का कार्यकाल भाजपा के कोर बुनियादी मुद्दों को निपटाने के काम आएगा।

सवाल है कि आखिर दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही सरकार ने ऐसा रुख क्यों अख्तियार किया है? क्या यह माना जाए कि पांच साल तक सरकार ने जो कुछ किया उस पर अब उसे भरोसा नहीं रहा है? असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को यह अंदाजा था कि देश के लोग उनकी सरकार को दूसरा कार्यकाल देंगे। इसलिए पहले कार्यकाल में उन्होंने सिर्फ उम्मीदें पैदा करने का काम किया। उन्होंने अपने पुराने एजेंडे को जिंदा रखा और सोशल मीडिया के जरिए भाजपा के समर्थकों को यह भरोसा दिलाते रहे कि सरकार कश्मीर, अयोध्या, समान नागरिक संहिता आदि मुद्दों को भूली नहीं है।

कहा जा सकता है कि मोदी और शाह पहले ही कार्यकाल में इन मुद्दों को निपटाना नहीं चाहते थे। उनको पता था कि ये मुद्दे बने रहेंगे तो लोग उनको दूसरा कार्यकाल देंगे। इसलिए पहले कार्यकाल में लोक कल्याणकारी और गरीब हितकारी चेहरा दिखाने पर जोर रहा। चुनाव प्रचार में भले जो भी विभाजनकारी एजेंडा चलाया गया हो पर सरकार के कामकाज के जरिए अपने विरोधियों को भी ऐसा संदेश दिया गया कि केंद्र की सरकार किसी विभाजनकारी एजेंडे पर काम नहीं कर रही है। वह सबका साथ, सबका विकास के लिए काम कर रही है। एक खास बात यह भी कि पहली बार में भाजपा को निगेटिव वोट मिले थे। कांग्रेस के दस साल के राज से उबे हुए लोगों ने उसे वोट दिया था। पर दूसरी बार उसे पॉजिटिव वोट मिला और वह भाजपा के कोर एजेंडे को पूरा करने के लिए था।

दूसरी बार ज्यादा बहुमत से जीतने के बाद भाजपा को पता था कि अब उसे सिर्फ अपने समर्थकों को जवाब देना हैं क्योंकि विरोधी पराजित होकर पस्त पड़े हैं। तभी उसने पहले दिन से अपने कोर एजेंडे और भावनात्मक मुद्दों को निपटाना शुरू किया। पहले ही सत्र में सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधानों को खत्म कर दिया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया। यह सरकार का ऐतिहासिक फैसला था। भारतीय जनसंघ और भाजपा दोनों का यह कोर एजेंडा रहा है।

अयोध्या का मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निपटा है पर उस पर सरकार की मुहर बहुत साफ देखी जा सकती है। अब केंद्र सरकार ही अयोध्या में बड़ा राम मंदिर बनाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला को दी है और अब सरकार अपने नियंत्रण वाली 67 एकड़ जमीन भी दे देगी। इसी तरह सरकार ने तीन तलाक की प्रथा को रोका है और माना जा रहा है कि समान नागरिक संहिता को भी हकीकत बनाने के लिए काम हो रहा है।

असल में पहले पांच साल मोदी और शाह ने उम्मीदें पैदा कीं और बनाए रखी तो इस पांच साल में दोनों नेता अपने को आम जनता खास कर बहुसंख्यक हिंदू जनता की उम्मीदें पूरा करने वाले नेता के रूप में स्थापित करेंगे। इसलिए एक एक करके सारे भावनात्मक मुद्दों पर फैसला होगा। तमाम ऐतिहासिक ग्रंथियों को सुलझाया जाएगा। इससे एक तो पार्टी का एजेंडा पूरा होगा ही दूसरे मौजूदा आर्थिक संकट से भी लोगों का ध्यान हटा रहेगा।

हालांकि यह स्थायी नहीं होगा क्योंकि आर्थिक संकट का दायरा बढ़ेगा तो भावनात्मक मुद्दों को निपटाना काम नहीं आएगा। फिर अगले कुछ चुनावों तक सरकार ऐसे एजेंडे पूरे करती रहेगी, जिसका वादा भाजपा और जनसंघ के संस्थापकों ने किया था। तभी सवाल है कि जब सारे एजेंडे पूरे हो जाएंगे तब क्या होगा? तब के लिए क्या मोदी और शाह नए एजेंडे तैयार कर रहे हैं?

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