भाजपा चुनावी वादे पूरा कर रही है

यह बड़ा सनातन सा और भारतीय राजनीति में यक्ष प्रश्न जैसा है कि अगर कोई पार्टी अपने घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करती है तो क्या उसके लिए उसकी आलोचना हो सकती है? यह सवाल कुछ समय पहले अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी उठा था, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ चुनिंदा मुस्लिम देशों से आने वाले लोगों पर पाबंदी लगाई थी और अपनी कंपनियों के लिए संरक्षणवादी रवैया अपनाया था। तब बचाव में यहीं तर्क दिया गया था कि अमेरिका के लोगों ने उनको इसके लिए वोट किया है।उन्होंने चुनाव में वादा किया था कि उनकी सरकार बनी तो अमेरिका को सुरक्षित रखने के लिए वे चुनिंदा मुस्लिम देशों से लोगों के आने पर पाबंदी लगाएंगे, वीजा के नियम सख्त बनाएंगे और अपनी कंपनियों को बचाने के लिए आयात नियमों को बदलेंगे और अपने लोगों को रोजगार दिलाने के लिए भी वीजा नियमों में बदलाव करेंगे।

यह सवाल अब भारत में उठा है। भारतीय जनता पार्टी अपने चुनाव घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा कर रही है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भाजपा के घोषणापत्र में पिछले तीन दशक से है। भाजपा ने 1989 के चुनाव में पहली बार इसका जिक्र अपने घोषणापत्र में किया। उसके बाद से लेकर इस पर खूब राजनीति हुई और भाजपा सवालों के घेरे में भी रही। अपनी इस घोषणा को लेकर भाजपा न सिर्फ अपने समर्थकों के सवालों के घेरे में थी, बल्कि विपक्षी पार्टियों का भी उसके ऊपर हमला हो रहा है।मजेदार बात यह है कि विपक्ष का हमला इस बात को लेकर नहीं था कि भाजपा ने क्यों मंदिर का धार्मिक मुद्दा अपने चुनाव घोषणापत्र में शामिल किया है। कांग्रेस या किसी दूसरी विपक्षी पार्टी ने कभी चुनाव आयोग में इस बात की शिकायत नहीं की है कि भाजपा के नेता मंदिर के नाम पर वोट मांग रहे हैं। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के नेता कांग्रेस पर यह सवाल उठाते थे कि वह मंदिर का वादा कब पूरा करेगी।

यह भारतीय राजनीति की उलटबांसी है। भाजपा समर्थक या भाजपा को वोट देने वाले लोग संतोष के साथ बैठे थे कि कभी न कभी तो मंदिर बनेगा। पर कांग्रेस और विपक्षी पार्टियां भाजपा को चिढ़ाती रहती थीं कि उसने अपना वादा पूरा नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी की गठबंधन की सरकार के सामने कई बार यह चुनौती उछाली गई कि वे मंदिर क्यों नहीं बनवा रहे हैं। इस बहाने भाजपा को झूठ बोलने और वादा नहीं पूरा करने वाली पार्टी बताया जाता रहा। तभी सवाल है कि अब जबकि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो रहा है और भाजपा आगे बढ़ कर उसमें कोई भूमिका निभा रही है तो उसकी क्यों आलोचना होनी चाहिए?भाजपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में इसका जिक्र किया था, इसके नाम पर उसने वोट मांगे थे, किसी पार्टी ने मंदिर के नाम पर वोट मांगने को संविधान के लिए खतरा बता कर भाजपा के इस वादे को चुनौती नहीं दी थी और लोगों ने इस वादे पर उसको वोट दिया भी, फिर जब वह अपना वादा पूरा कर रही है तो क्या इसकी आलोचना होनी चाहिए?

इसी तरह जम्मू कश्मीर का मामला भाजपा से भी पहले भारतीय जनसंघ के जमाने से चला आ रहा है। जनसंघ के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सबसे पहले एक देश, एक विधान, एक निशान का नारा दिया था। रहस्यमय स्थितियों में उनकी मौत कश्मीर में ही हुई थी। सो, अनुच्छेद 370 हटाने का मामला भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में पिछले 70 साल से था। जनसंघ और भाजपा के इस एजेंडे का भी विपक्षी पार्टियों ने कभी विरोध नहीं किया। कभी यह नहीं कहा गया कि जब संसद और संविधान ने कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया हुआ है और उस राज्य के विलय की संधि के मुताबिक कई चीजें उसे दूसरे राज्यों से अलग करती हैं तो क्यों भाजपा उसकी संवैधानिक स्थिति बदलने का वादा कर रही है। यह एक तरह से स्वीकार्य एजेंडा था और तभी सरकार बनने के बाद जब भाजपा ने अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला किया तो उसकी आलोचना नहीं होनी चाहिए थी।

समान नागरिक संहिता का मामला भी इसी तरह का मामला है। भाजपा ने इसका वादा दशकों पहले किया था और अगर सरकार उस दिशा में पहल कर रही है तो विपक्ष को क्या उसकी आलोचना करनी चाहिए? हैरान करने वाली बात यह है कि दशकों से जो बातें कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को भाजपा के घोषणापत्र में मंजूर थीं, उन पर अमल किया जाना उनको पसंद नहीं आ रहा है। तो क्या यह माना जाए कि कांग्रेस और दूसरी पार्टियां इस मुगालते में थीं कि भाजपा ने घोषणापत्र में ये बातें कही हैं और इन पर वह अमल नहीं करेगी? या अब तक भारतीय राजनीति का यहीं सत्य रहा है कि घोषणापत्र में कही गई बातों को नहीं लागू किया जाता है? और अब भाजपा उसे लागू कर रही है तो सबको बेचैनी हो रही है? क्या इससे भारतीय राजनीति में घोषणापत्र का महत्व और चुनावी वादों का महत्व स्थापित होता है?

भारतीय जनता पार्टी ने अनुच्छेद 370 या राम मंदिर या तीन तलाक आदि पर जो किया उसके गुणदोष पर उसका मूल्यांकन अपनी जगह है पर इससे इनकार नहीं है कि ये तीनों बातें भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में थीं, इन पर भाजपा ने वोट मांगे थे, विपक्ष ने इन मुद्दों पर वोट मांगने का विरोध नहीं किया था और लोगों ने इन मुद्दों पर भाजपा को वोट दिया। इसलिए अब अगर भाजपा इन पर अमल कर रही है तो इसके लिए उसकी आलोचना नहीं की जा सकती है। अगर ये बातें गलत हैं तो पहले ही इनका विरोध किया जाना चाहिए था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares