BJP : पॉवर सेंटर और जोर-आजमाइश का दौर..

शिवराज सिंह चौहान
मध्यप्रदेश में भाजपा का सबसे बड़ा पॉवर सेंटर अभी भी शिवराज सिंह चौहान बने हुए हैं। चौहान अपनी दिल्ली यात्रा और इस दौरान अमित शाह। जेपी नड्डा से मुलाकात के बाद चर्चा में हैं तो उसकी वजह भाजपा का संगठन चुनाव। नया प्रदेश अध्यक्ष और झाबुआ उपचुनाव में मिली हार के बाद पवई विधायक प्रहलाद लोधी की सदस्यता का खतरे में आ जाना। जिससे लगातार कमलनाथ सरकार न सिर्फ मजबूत होती जा रही। बल्कि भाजपा को एक के बाद एक झटके खाने को मजबूर होना पड़ा। ऐसे में भाजपा की आगामी रणनीति में शिवराज का किरदार आखिर क्या होगा।

न्यायालय से प्रहलाद को मिली राहत के बाद शिवराज इस बार मीडिया के सामने आए तो उनके साथ कमलनाथ से मोह भंग के बाद भाजपा में लौटे नारायण त्रिपाठी थे।  भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जो 13 साल मुख्यमंत्री रह चुके। राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी निभाने के साथ मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा सक्रिय भाजपा नेता के तौर पर मैदान में अभी भी डटे हुए। विधायक होने के नाते सदन के अंदर और अपने विधानसभा क्षेत्र तक सीमित न रहते हुए गैर राजनीतिक मोर्चे पर ही सही जनता के बीच लगातार अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज करा रहे मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर तीखी तल्ख और अपने स्वभाव के विपरीत कुछ ज्यादा ही आक्रामक टिप्पणी के कारण सबसे ज्यादा मुखर नेता के तौर पर पहचाने जाते हैं।

बावजूद इसके भाजपा के अंदर एक खेमा यह मानकर चल रहा है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ उनकी अंडरस्टैंडिंग बनी हुई है.. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा के अलावा शिवराज संघ के भी लगातार संपर्क में बने हुए हैं। शिवराज ने हमेशा खुद को मध्यप्रदेश तक सीमित रखते हुए ही बदलती बीजेपी में अपनी राजनीति को आगे बढ़ाया.. जिन्होंने ना तो लोकसभा का चुनाव लड़ा और ना ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने पर अपनी सहमति दर्ज कराई। जिनके खाते में सरकार रहते जन हितेषी योजनाएं बड़ी उपलब्धि तो मुख्यमंत्री रहते दो चुनाव में भाजपा की जीत सुनिश्चित कर उसे सत्ता में लौटाना भी शामिल.. भाजपा के अंदर जननायक के तौर पर स्थापित शिवराज ने साबित किया कि चुनाव जिताने का माद्दा वह रखते हैं। जिन्होंने विपक्ष में रहते भी जनता के बीच में अपनी पकड़ और लोकप्रियता साबित की है।

मध्यप्रदेश में भाजपा के अंदर दूसरे महत्वाकांक्षी नेताओं चाहे फिर वह प्रदेश अध्यक्ष नेता प्रतिपक्ष। मुख्य सचेतक। केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय पदाधिकारी चाहकर भी उन्हें इग्नोर नहीं कर पा रहे। पीढ़ी परिवर्तन के दौर में जब मोदी से ज्यादा शाह का संगठन और राज्यों की राजनीति में दखल देखने को मिल रहा। फिर भी शिवराज अंगद के पांव की तरह मध्यप्रदेश में मैदान छोड़ने को तैयार नहीं। जब भी भाजपा कमलनाथ के खिलाफ मोर्चा खोलती.. घेराबंदी करने की रणनीति बनाती तब बिना शिवराज के भाजपा के लिए आगे बढ़ना संभव नहीं हो पाता, भाजपा संसदीय बोर्ड के सदस्य शिवराज भले ही अपनी विरोधी कांग्रेस के खिलाफ लगातार मोर्चा खोले हुए हो, लेकिन अब भाजपा के अंदर से भी उनकी घेराबंदी की चर्चा सुनाई देने लगी। मध्य भारत से निकले शिवराज सिंह चौहान ही भाजपा के एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिनकी स्वीकार्यता अभी तक भाजपा के अंदर बनी रही। तो विंध्य, बुंदेलखंड से लेकर निमाड़ -मालवा ,ग्वालियर -चंबल से महाकौशल तक उनका अपना जनाधार है। जिसे शिवराज फैक्टर के तौर पर जाना जाता है ।

राकेश सिंह
राकेश सिंह जिनकी सांसद रहते बतौर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लांचिंग अमित शाह के भरोसेमंद नेता के तौर पर हुई थी। महाकौशल से निकलकर बाया दिल्ली भोपाल में संगठन के सूत्रधार बने राकेश एक बार फिर प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर लगातार दूसरी पारी खेलने के लिए अपनी जमावट में लगे हुए। मिशन 2019 लोकसभा चुनाव को यदि मोदी और शाह के खाते में डाला जाएगा तो फिर राकेश सिंह के खाते में उपलब्धियां कम नाकामियां ज्यादा। जिनके प्रदेश अध्यक्ष रहते ही भाजपा 15 साल बाद सत्ता से बाहर हुई जिम्मेदारी भले ही शिवराज सिंह चौहान ने ली।

लेकिन राकेश सिंह की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल खड़े हुए शिवराज को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद संगठन के बड़े सूत्रधार होने के बावजूद राकेश सिंह भाजपा के अंदर बढ़ती गुटबाजी को नहीं रोक पाए। अमित शाह और राष्ट्रीय नेतृत्व का एजेंडा वह मध्यप्रदेश में आगे बढ़ा रहे। लेकिन संगठन मजबूत साबित हो रहा यह संदेश अभी तक वो चाहे कर भी नहीं दे पाए। लगातार लोकसभा के चुनाव जीतने के बावजूद प्रदेश के जनाधार वाले नेता के तौर पर वह अभी तक स्थापित नहीं हो पाए। संगठन की रणनीति बंद कमरे में नेता विशेष की बैठकर उनके कार्यक्रमों में छुपे संदेश को समझा जाए तो राकेश सिंह के नेतृत्व में बदलती भाजपा की स्िक्रप्ट लिखी जा रही है। जिसमें शिवराज के बिना यानी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के साथ भविष्य में केंद्रीय भूमिका में और सक्रिय किए जाने के साथ आखिर भाजपा मध्यप्रदेश में कमलनाथ और कांग्रेस के मुकाबले खुद को कैसे बेहतर साबित कर सत्ता हासिल कर सकती है।

राकेश सिंह और शिवराज के बीच भरोसे का संकट चर्चा का विषय बनता रहा है तो प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका में राकेश सिंह की कोशिश नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव और मुख्य सचेतक नरोत्तम मिश्रा को सुविधा के अनुसार भरोसे में लेकर आगे बढ़ने की रही। जो कैलाश विजयवर्गीय से लेकर प्रभात झा और केंद्रीय मंत्री खासतौर से नरेंद्र सिंह से भी संवाद और संपर्क बनाए हुए संगठन महामंत्री सुहास भगत को नजरअंदाज करने का जोखिम वह मोल नहीं लेते। विपक्ष में रहते शिवराज गोपाल भार्गव और नरोत्तम मिश्रा के मुकाबले भाजपा के सबसे ताकतवर नेता के तौर पर फिलहाल वह अपने आपको चाहकर भी स्थापित नहीं कर पा रहे। भले ही राष्ट्रीय नेतृत्व के वरदहस्त के चलते उनका दबदबा बना हुआ है। देखना दिलचस्प होगा कि जिस प्रदेश भाजपा को वह शिवराज से मुक्त कराने की मंशा रख अपने समर्थकों के साथ नई पीढ़ी तैयार करना चाहते हैं उनके लिए प्रदेश अध्यक्ष भविष्य में बने रहना किसी चुनौती से कम नहीं माना जा रहा।

नरोत्तम मिश्रा
पूर्व संसदीय मंत्री और भाजपा के मुख्य सचेतक नरोत्तम मिश्रा। जो ग्वालियर चंबल से लेकर बुंदेलखंड की राजनीति में अपनी अहमियत का एहसास कराते रहे। इन दिनों चर्चा में है चाहे फिर उसकी वजह ई टेंडरिंग घोटाले और दूसरे मामलों में कमलनाथ सरकार के निशाने पर होना या फिर शिवराज के बाद भाजपा को नेतृत्व देने को लेकर जारी रस्साकशी। जिन्हें कभी शिवराज सिंह चौहान का संकटमोचक माना जाता था। इन दिनों बदलती भाजपा में दूसरे नेताओं की तुलना में एक अलग पॉवर फैक्टर के तौर पर खुद को विकसित कर रहे हैं।

अमित शाह के सीधे संपर्क में होने के कारण अपनी आक्रामक राजनीति को लगातार धार दे रहे और कोई समझौता नहीं करते दिख रहे हैं।शिवराज सरकार के रहते राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर अमित शाह का नरोत्तम मिश्रा के आवास पर हुआ लंच उन्हें भाजपा में पहले ही एक अलग ऐसे नेता के तौर पर विकसित कर चुका है। जो सीधे राष्ट्रीय नेतृत्व के संपर्क में हैं। तो संसदीय मंत्री रहते विधायकों के पहले से ही संपर्क में हैं, जिसने विधायक और मंत्री रहते उत्तर प्रदेश से लेकर दूसरे कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी को निभाया है। शिवराज के बाद सदन में ओजस्वी वक्ता तो फ्लोर मैनेजमेंट से आगे बंद कमरे की राजनीति में मैनेजमेंट के मोर्चे पर अपनी छाप छोड़ी है। सरकार में रहते विरोधियों के नेताओं और विधायकों को भाजपा के पाले में खड़ा करना या फिर भाजपा के लिए एक बार फिर जरूरी संख्या जुटाने का काम नरोत्तम के बिना संभव नहीं। जो कांग्रेसी ही नहीं निर्दलीय सपा और बसपा नेताओं के भी संपर्क में बने हुए हैं।

नरोत्तम मिश्रा टास्क को चुनौती के तौर पर लेते तो अपनी महत्वाकांक्षाओं को भी छुपाते नहीं, भाजपा के अंदर भले ही सदन में वह नेता प्रतिपक्ष या फिर प्रदेश अध्यक्ष बनते बनते रह गए। फिर भी उनके हौसले बुलंद हैं। जिनके निशाने पर भले ही कांग्रेस और कमलनाथ सरकार नजर आती हो। लेकिन भाजपा के अंदर भी अपनी लाइन बड़ी करने में वह बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे। इन दिनों नरोत्तम का आवास भाजपा ही नहीं दूसरे नेताओं की बढ़ती चहल-कदमी के कारण पॉवर सेंटर के तौर पर चर्चा में है। जनसंपर्क मंत्री रहते जो संबंध मीडिया से बनाए थे उसकी निरंतरता बनाए रखने में बढ़-चढ़कर रुचि लेना किसी से छुपा नहीं। भाजपा प्रवक्ताओं से भी इन दिनों मेलजोल बढ़ा रहे हैं। प्रदेश भाजपा की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव के साथ नरोत्तम चौथे ऐसे नेता है जो प्रमुख रणनीतिकारों में शामिल है।.. जारी पार्ट 2

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares