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ब्रिटेन में अनंत अनिश्चितताएं

ब्रिटेन के ताजा आम चुनाव बेशक ब्रेग्जिट को लेकर जारी अनिश्चितता का अंत हो गया है। लेकिन इससे यह समझ लेना कि ब्रिटेन अब निश्चिंत हो गया है, बड़ी भूल होगी। दरअसल, अब अनिश्चिय खुद ब्रिटेन के भविष्य को लेकर पैदा हो गया है। गौरतलब है कि इंग्लैंड के अलावा ब्रिटेन के बाकी तीन हिस्सों- स्कॉटलैंड, उत्तरी आयरलैंड और वेल्स में ब्रेग्जिट लोकप्रिय मांग नहीं है। बल्कि स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरैंड में तो इसके खिलाफ भावना है। 2014 में स्कॉटलैंड में आजादी के सवाल पर जनमत संग्रह हुआ था। तब आजादी समर्थक हार गए थे। लेकिन ब्रेग्जिट का एजेंडा सामने आते ही वहां फिर ये मांग प्रबल हो गई। स्कॉटलैंड के राष्ट्रवादियों का कहना रहा है कि वे तभी तक ब्रिटेन के साथ हैं, जब तक ब्रिटेन यूरोपीय संघ की उदारवादी और प्रगतिशील परियोजना के साथ है। अगर ब्रिटेन उससे अलग होता है, तो वे फिर आजादी के सवाल पर जनमत संग्रह कराना चाहेंगे। उधर उत्तरी आयरलैंड में एक बार फिर से आयरलैंड के साथ इस इलाके के विलय की चर्चा शुरू हो गई है। अब बहुत से समीक्षक मानते हैं कि आने वाले वर्षों या दशकों में ब्रिटेन की सीमाएं महज इंग्लैंड और वेल्स तक सीमित हो सकती हैं। ऐसी संभावनाएं अब ज्यादा मजबूत हो गई हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की पहचान एक कल्याणकारी राज्य के रूप में रही।

प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली के जमाने में एनएचएस (राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा) की नींव डाली गई थी। उसके बाद 1979 में मार्गरेट थैचर के सत्ता में आने तक ब्रिटेन कल्याणकारी राज्य और मजदूर हितों वाली नीतियों पर चलता रहा। गुजरे 40 साल धुर नव-उदारवाद के रहे हैं, जिससे ब्रिटेन में गरीबी और गैर-बराबरी बढ़ी है। ब्रेग्जिट समर्थकों ने इसी से पैदा हुई नाराजगी का फायदा उठाया। उन्होंने बीमारी की सही पहचान करने के बजाय यह बताया कि ये हाल ब्रिटेन आकर बसे विदेशियों के कारण हुआ है। प्रचारित किया गया कि ऐसा इसलिए संभव हुआ, क्योंकि यूरोपीय संघ की उदारवादी नीतियों के तहत विदेशियों को आने से रोकना संभव नहीं था। तो मांग उठी कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो जाए। उधर लेबर पार्टी अब कहीं ज्यादा बड़े अनिश्चिय में होगी। जेरमी कॉर्बिन नेता पद छोड़ने का एलान कर चुके हैं। मगर क्या कोर्बिन-वाद का भी अंत हो जाएगा? ये तमाम अनिश्चितताएं ये चुनाव छोड़ गया है।

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