ऐतिहासिक बजट कैसा होगा?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और दूसरा बजट तैयार कर रही हैं। उनके पहले बजट ही हाईलाइट यह थी कि चमड़े के ब्रीफकेस की बजाय वे झोले में बजट लेकर संसद पहुंची थीं। इसके अलावा उस बजट में कुछ खास नहीं था। उस बजट में जितनी बातें थीं, उससे ज्यादा तो निर्मला सीतारमण बजट के बाद कोरोना वायरस की महामारी के बीच कर चुकी हैं। बजट से ज्यादा घोषणाएं मई-जून के महीने में हुईं। बजट से ज्यादा सुधार साल के मध्य में हुए। सरकार ने समूचे कृषि सेक्टर को बदल दिया। तीन ऐसे सुधार किए, जिनके खिलाफ देश के किसान आंदोलन कर रहे हैं। श्रम कानूनों को लगभग पूरी तरह से बदल दिया गया। बजट के बाद दो या तीन बार में 21 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के एक राहत पैकेज की घोषणा हुई, जिसका फायदा पता नहीं किन लोगों को हुआ।

तभी जब निर्मला सीतारमण ने कहा कि इस बार का बजट ऐसा होगा, जैसे पहले कभी नहीं रहा तो कोई हैरानी नहीं हुई। क्योंकि बजट में पहले जो चौंकाने वाला या हैरान करने वाला तत्व होता था वह खत्म हो गया है। अब बजट में कुछ और कहा जाता है और साल भर सरकार कुछ और करती रहती है। इसके बावजूद यह तो देखना ही होगा कि वित्त मंत्री कैसा ऐतिहासिक बजट तैयार कर रही हैं। यह भी सोचना होगा उन्होंने अभूतपूर्व बजट की बात कही है तो लोगों को उससे डरना चाहिए या कुछ अच्छा होने की उम्मीद करनी चाहिए?

जहां तक कुछ राहत मिलने की उम्मीद करने का सवाल है तो वह लोगों को भूल जाना चाहिए क्योंकि अगले बजट में लोगों को कुछ मिलने नहीं जा रहा है। इसका कारण यह है कि जिस समय देश के लोग सबसे बड़ा संकट झेल रहे थे, अपने घरों में बंद थे, सारे कारोबार ठप्प पड़े थे, रोजगार खत्म हो रहे थे और देश की आर्थिक पहली तिमाही में 24 फीसदी गिर गई थी, तब सरकार ने कुछ नहीं दिया तो अब जबकि कोरोना के केसेज खत्म हो रहे हैं, वैक्सीन आ गई है और अर्थव्यवस्था माइनस से निकल कर शून्य के आसपास पहुंच गई है तो सरकार क्यों कुछ राहत देगी? आम लोगों को राहत देने की बजाय उलटे सरकार अगर नए बोझ लादे तो भी हैरानी नहीं होगी।

इसकी वजह यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ रही है। जब कच्चे तेल के दाम बिल्कुल गिरे हुए थे तब सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ा कर उसका लाभ लोगों को नहीं मिलने दिया और अभी देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंची है। रसोई गैस के सिलिंडर में सरकार ने एक महीने में 105 रुपए की बढ़ोतरी की है तो देश के आधा दर्जन राज्यों में पेट्रोल 90 रुपए लीटर से ऊपर बिक रहे हैं। इनके सबसे बीच चर्चा है कि इस बार बजट में कोविड सरचार्ज लगाया जा सकता है। यह किन चीजों पर लगाया जाएगा, यह पता नहीं है पर उसके क्या फर्क पड़ता है। किसी चीज पर लगाया जाए, कीमत तो आम लोगों को ही चुकानी होगी!

आम लोगों की एक चिंता रोजगार की है और ऐसा माना जाता है कि बड़ी और बहुत बड़ी कंपनियों की बजाय छोटे व मझोले उद्योगों का रिवाइवल होगा तो लोगों को रोजगार मिलेगा। इस सेक्टर को भी सीधी मदद देने की बजाय सरकार ने कोरोना की अवधि में इनको कर्ज लेने के लिए प्रेरित किया। इसका नतीजा हुआ कि ज्यादातर ऐसी कंपनियां बंद हो गईं या बंद होने की कगार पर हैं। वैसे भी नोटबंदी और जीएसटी की वजह से बहुत सारी छोटी व मझोली कंपनियां बंद हो गई हैं। ध्यान रहे भारत में साढ़े चार करोड़ के करीब ऐसी कंपनियां हैं और पंजीकृत कंपनियों की संख्या 12 लाख से ऊपर है, इनमें से भी बड़ी कंपनियों की संख्या कुछ हजार में है। कोरोना वायरस का एक असर यह हुआ है कि बड़ी कंपनियां और बड़ी होती गईं, जबकि छोटी कंपनियां खत्म होती गईं। सो, सरकार अगर छोटी व मझोली कंपनियों को नहीं पुनर्जीवित करती हैं और उनको फर्जी मानने की जिद नहीं छोड़ती है तब तक रोजगार के मोर्चे पर भी कोई खास सुधार नहीं होगा।

इससे पहले बजट में कृषि के नाम पर जो भी होता था वह कृषि आधारित उद्योगों के लिए होता था। सरकारें कृषि और किसान के नाम पर कृषि आधारित उद्योगों और बड़े उद्योगपतियों को बढ़ावा देती रही हैं। उनके लिए ही बड़े कर्ज की घोषणा होती है और उन्हीं के कर्ज माफ होते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि इस बार किसान आंदोलन की छाया में तैयार हो रहे बजट में किसानों का भला करने वाले कुछ उपाय होंगे। सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की बजाय उनकी न्यूनतम आय सुनिश्चित करने के लिए कोई योजना लाए तो उसका फायदा ज्यादा होगा।

लेकिन चिंता इस बात को लेकर है कि सरकार मध्य वर्ग की समस्याओं, किसानों की मुश्किलें, छोटे व मझोले कारोबारियों की परेशानियों को समझने की बजाय शेयर बाजार, शेयर बाजार में संस्थागत विदेशी निवेश और निजी कंपनियों में आए निवेश को ध्यान में रख कर बजट न बनाए। कारोबारी अखबारों में पिछले कई दिनों से अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर दिखाई जाने लगी हैं। कॉरपोरेट के लिए काम करने वाले कई कथित आर्थिक जानकार यह लिखने लगे हैं कि अगले वित्त वर्ष यानी 2021-22 के अंत में ही भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था हो जाएगी। वे अपनी बात साबित करने के लिए शेयर बाजार की ऐतिहासिक ऊंचाई का हवाला दे रहे हैं और रिलायंस को मिले विदेशी निवेश की बातें कर रहे हैं। कोरोना वायरस खत्म होने और वैक्सीन आने के हवाले भी उम्मीद जताई जा रही है कि देश की अर्थव्यवस्था सुधर जाएगी। लेकिन इन सबसे देश की आर्थिक हालत की अधूरी तस्वीर बनती है। असली तस्वीर भयावह है और उसे समझे बगैर एक अच्छा बजट संभव नहीं है।

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