लोग समझे पहले विरोध का मुद्दा

तन्मय कुमार- नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने एक बहुत कायदे की बात कही है। उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा कि लोगों को विरोध के मुद्दे को समझना चाहिए। उनके कहने का संदर्भ व्यापक था पर यह बात संशोधित नागरिकता कानून के मुद्दे पर देश भर में चल रहे आंदोलन पर भी लागू होती है। और साथ ही ऐसे छूट गए मुद्दों पर भी लागू होती है, जिन पर कायदे से आंदोलन होना चाहिए था पर नासमझी की वजह से या किसी और कारण से लोग और पार्टियां दोनों ने उन मुद्दों पर आंदोलन नहीं किया। कहा जा सकता है कि उन्हें मुद्दों की समझ नहीं या यह अंदाजा नहीं है कि कौन सा मुद्दा उन्हें कितना लाभ दिला पाएगा।

बहरहाल, संशोधित नागरिकता कानून, सीएए और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर, एनपीआर व राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, एनआरसी के मामले में समर्थन और विरोध करने वाले दोनों एक ही बात कह रहे हैं। वे एक दूसरे पर देश के लोगों को गुमराह करने के आरोप लगा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह हर जगह कह रहे हैं कि विपक्षी पार्टियां देश के लोगों को गुमराह कर रही हैं और उन्हें दंगे के लिए उकसा रही हैं। दूसरी ओर सोमवार को 20 विपक्षी पार्टियों की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि मोदी और शाह देश के गुमराह कर रहे हैं। सवाल है यह कैसा मुद्दा है, जिस पर पक्ष-विपक्ष दोनों देश के गुमराह कर रहे हैं और देश गुमराह हो भी जा रहा है? ऐसा है तो इस मुद्दे को छोड़ते क्यों नहीं हैं, तब तक, जब तक कि चीजें स्पष्ट नहीं हो जाती हैं?

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चुनौती देते हुए कहा कि राहुल गांधी, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल तीनों मिल कर नागरिकता कानून में कोई भी ऐसा प्रावधान दिखाएं, जिसमें किसी की नागरिकता लेने की बात कही गई हो। इस चुनौती को स्वीकार करने की बजाय राहुल गांधी ने सोमवार को विपक्षी पार्टियों की बैठक के बाद मोदी और शाह के लिए एक दिलचस्प चुनौती उछाली। उन्होंने कहा कि मोदी किसी भी विश्वविद्यालय में जाकर वहां के छात्रों के बताएं कि उन्होंने उनके लिए क्या किया है।

राहुल ने यह भी कहा कि इस देश के किसान और छात्र दोनों सरकार से सबसे ज्यादा नाराज हैं। जब राहुल को पता है कि छात्र और किसान सबसे ज्यादा नाराज हैं और सरकार ने इनके लिए कुछ नहीं किया है तो आंदोलन इस मुद्दे पर क्यों नहीं किया जा रहा है? छात्रों और किसानों के मुद्दे पर देश भर की पार्टियां सड़क पर क्यों नहीं उतर रही हैं, जो एक ऐसा मुद्दा पकड़ कर बैठी हैं, जिसके बारे में लोगों को समझ ही नहीं है।

मोदी और शाह पर कितना भी लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया जाए पर नागरिकता कानून बहुत स्पष्ट और दो टूक है। इसमें साफ कहा गया है कि तीन मुस्लिम बहुल देशों से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर भारत आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन और ईसाई को भारत की नागरिकता मिलेगी। इसमें कोई बात ऐसी नहीं है, जो गुमराह करने वाली है। हां, यह कानून सांप्रदायिक है। इसमें धर्म के आधार पर नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। इस आधार पर तो कानून का विरोध हो सकता है। पर मुश्किल यह है कि देश की ज्यादातर विपक्षी पार्टियां खुद ही नहीं चाहती हैं कि सांप्रदायिक आधार पर कानून का विरोध हो क्योंकि इससे उनको राजनीतिक रूप से नुकसान हो सकता है। तभी वे इसमें एनआरसी को शामिल कर रहे हैं, जिसकी अभी शुरुआत नहीं हुई है।

गुमराह करने के आरोपों को जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी साफ कर दिया कि नागरिकता देने के पुराने प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यानी दुनिया के किसी भी देश का नागरिक भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है और सरकार मेरिट के आधार पर उस बारे में फैसला करेगी। जैसे सरकार ने पाकिस्तान के रहने वाले अदनान सामी को भारत की नागरिकता दी और बांग्लादेश की रहने वाली तस्लीमा नसरीन को आज तक भारत की नागरिकता नहीं मिली है। नागरिकता हासिल करने की इस प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यानी ठोस और उचित कारण बता कर कोई मुस्लिम विदेशी भी भारत की नागरिकता हासिल कर सकता है।

जाहिर है कि नागरिकता कानून में कुछ भी गुमराह करने वाला नहीं है। पर ऐसा लग रहा है कि इसका विरोध करने वालों को इसकी पूरी समझ नहीं है या एक किस्म की पैरानोइया के शिकार हो गए हैं। उनको आशंका हो गई है कि यह सरकार उनकी नागरिकता खत्म कर देगी। पर इस आशंका का भी कोई ठोस आधार नहीं है। अगर नागरिकता कानून का विरोध कर रहे लोग इस कानून के बारे में जानेंगे और एनपीआर व एनआरसी की वास्तविकता को समझेंगे तो वे अपने आप इसका विरोध खत्म कर देंगे। पर मुश्किल यह है कि भारत में विरोध और समर्थन करने वाली भीड़ मुद्दों को समझती ही नहीं है।

अन्ना हजारे के आंदोलन के समय भी बहुत कम ही लोग थे, जो लोकपाल को समझते थे। पर आंदोलन में शामिल सबको यह भ्रम दिया गया था कि लोकपाल आ गया तो सबका जीवन सुखी हो जाएगा, भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा। अफसोस की बात है कि दस साल बाद भी सब कुछ जस का तस है और लोकपाल भी बन गया है। उसी तरह नागरिकता मामले में लोगों को यह भ्रम दिया गया है कि यह लागू हो गया तो सब कुछ खत्म हो जाएगा। जबकि असलियत में ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है।

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