सीएए के नरम प्रतिरोध की राजनीति

शशांक राय – संशोधित नागरिकता कानून, सीएए पर देश बंटा हुआ है। इससे पहले संभवतः कभी ऐसा मौका नहीं आया, जब किसी कानून को लेकर इस किस्म का विभाजन हुआ हो। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करना एक मौका था। समाज तब भी बंटा था पर सड़क पर उतर कर हो रहा कानून का विरोध जल्दी ही समाप्त हो गया था। इस बार नागरिकता कानून के विरोध में चल रहे आंदोलन का दायरा भी बड़ा है, तीव्रता भी बड़ी है, इसकी वजह से हुआ सामाजिक विभाजन भी ज्यादा गहरा है और प्रतिरोध निरंतरता भी ज्यादा है।

पिछले करीब डेढ़ महीने से इसे लेकर विरोध चल रहा है। राजधानी दिल्ली से लेकर सुदूर किसी राज्य के छोटे से जिले में भी इस पर विरोध हो रहा है। कुछ जगहों पर इसका समर्थन भी हो रहा है पर समर्थन में हो रहा प्रदर्शन मोटे तौर पर प्रायोजित है। वह भाजपा की ओर से कराया जा रहा है या सरकार की ओर से कानून के समर्थन में रैलियां हो रही हैं।

संशोधित नागरिकता कानून के विरोध के दो पहलू हैं। एक बड़ा तबका है, जो इसका बहुत मुखर होकर विरोध कर रहा है। उसमें पूर्वोत्तर की कुछ पार्टियां और अपनी भाषा, अस्मिता बचाने के लिए लड़ रहे कुछ स्थानीय समुदाय शामिल हैं। उनके अलावा देश भर के मुस्लिम भी मुखर और आक्रामक होकर इसका विरोध कर रहे हैं। सीएए का मुखर विरोध करने वाली कुछ पार्टियां भी हैं, जिसमें ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सबसे अव्वल है और उसके बाद उनकी पुरानी प्रतिद्वंद्वी सीपीएम और सीपीआई हैं। कांग्रेस और उसकी सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल भी है पर इनका विरोध तृणमूल कांग्रेस जैसा मुखर नहीं है। इसमें मुस्लिम नेताओं की पार्टियां- ऑल इंडिया एमआईएम और ऑल इंडिया यूडीएफ भी हैं, जिनका विरोध मुखर है। पर देश की बाकी भाजपा विरोधी पार्टियों का प्रतिरोध नरम है। वे इस पर सवाल तो उठा रही हैं और इसके लिए भाजपा व केंद्र सरकार की आलोचना भी कर रही हैं पर सड़क पर उतर कर उस तरह से प्रदर्शन नहीं कर रही हैं, जैसे तृणमूल कांग्रेस या लेफ्ट पार्टियां कर रही हैं। कुछ पार्टियां ऐसी हैं, जो सीएए का समर्थन कर रही हैं पर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, एनआरसी का विरोध कर रही हैं, जैसे जनता दल यू।

बहरहाल, सीएए के नरम प्रतिरोध की राजनीति करने वाली पार्टियों में उत्तर भारत की बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का नाम खासतौर से लिया जा सकता है। दक्षिण भारत की ज्यादातर पार्टियों का विरोध नरम है या उनका कोई रुख नहीं है। कर्नाटक में कुछ समय पहले तक कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार चलाने वाली जेडीएस हो या तेलंगाना में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति हो या आंध्र प्रदेश में सरकार चला रही वाईएसआर कांग्रेस हो, उसकी विरोधी टीडीपी हो या तमिलनाडु की दोनों पार्टियां- अन्ना डीएमके और डीएमके हों।

दक्षिण की सारी पार्टियां या तो विरोध नहीं कर रही हैं या विरोध कर रही हैं तो सिर्फ जुबानी तौर पर। इसके ऐतिहासिक कारण हैं। असल में वहां मुस्लिम घुसपैठियों का मामला कभी रहा ही नहीं है। देश के विभाजन का बहुत मामूली असर दक्षिण के राज्यों पर हुआ है। सांप्रदायिकता की समस्या वहां प्रमुख नहीं है और इसलिए सांप्रदायिक राजनीति का दायरा भी बहुत सीमित है। इसलिए वहां की पार्टी तटस्थ भाव में राजनीति कर रही हैं।

सबसे हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस और शिव सेना जैसे दो वैचारिक ध्रुवों के बीच रह कर राजनीति कर रही शरद पवार की पार्टी एनसीपी ने भी बहुत कायदे से संतुलन बनाया है तो कांग्रेस के समर्थन से झारखंड में सरकार में आए झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन भी संतुलन बनाए हुए हैं। एनसीपी और जेएमएम दोनों नरम प्रतिरोध के रास्ते पर चल रहे हैं। दिल्ली सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल हमेशा संतुलन की राजनीति करते हैं। वे इतनी सावधानी बरतते हैं कि उनके किसी काम या बयान से सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति को फायदा न हो। और अभी तो दिल्ली में चुनाव चल रहे हैं। सो, मुख्यधारा की बड़ी पार्टियों में सपा, बसपा, एनसीपी, आप और जेएमएम को नरम प्रतिरोध वाली पार्टी माना जा सकता है।

सवाल है कि इन पार्टियों के नरम प्रतिरोध की रणनीति से क्या हासिल होने वाला है? क्या ये पार्टियां मान रही हैं कि उनकी इस चुनने और छोड़ने की रणनीति को लोग नहीं समझ रहे हैं? ये पार्टियां ऐसा समझ रही हैं कि दिखावे के लिए सीएए के विरोध में बयान दे दिया तो इससे मुस्लिम खुश हो जाएंगे और इसके खिलाफ सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन नहीं किया तो हिंदू खुश हो जाएंगे। अगर पार्टियों की समझ ऐसी है तो उन्हें भगवान ही बचा सकते हैं। इस तरह के वैचारिक मामलों मे दो टूक स्टैंड लेना होता है। पार्टियों और नेताओं को विरोध या समर्थन में खड़ा होना होता है। बीच का रास्ता उन्हें अंततः नुकसान पहुंचाएगा।

हालांकि इनमें से कई पार्टियां ऐसी हैं, जो मुस्लिम वोट की मजबूरी को समझ रही हैं और इसलिए नरम प्रतिरोध के जरिए उनके प्रति सहानुभूति दिखाते हुए मुख्य रुप से हिंदू वोट साधने का प्रयास कर रही हैं। ऐसा उन सभी जगहों पर हो रहा है, जहां कांग्रेस कमजोर है और कांग्रेस के वोट पर पनपी दूसरी प्रादेशिक पार्टी मजबूत है। जैसे आप को पता है कि दिल्ली के मुस्लिम भले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गए हों पर विधानसभा चुनाव में वे आप का साथ देंगे। यहीं उम्मीद उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा को है तो झारखंड में जेएमएम को और महाराष्ट्र में एनसीपी को है। अगर कांग्रेस इन राज्यों में मजबूत होती है तो निश्चित रूप से इन पार्टियों को नुकसान होगा।

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