धरना सेकुलर तो विरोध से ध्रुवीकरण कैसे?

शाहीन बाग़ के धरने से हिन्दू विरोधी सेकुलर जमात बहुत गदगद थी। इस जमात का वह सपना भी पूरा हो गया था कि शाहीन बाग जैसे धरने देश के हर शहर में हो| अब मुम्बई, लखनऊ, भोपाल, जयपुर आदि जगहों पर भी धरने शुरू हो गए हैं| शाहीन बाग़ धरने के आयोजक शरजिल इमाम गिरफ्तारी से पहले देश भर में घूम कर सेकुलर जमात का सपना पूरा कर रहा था। पर उस के भाषणों के दर्जन भर वीडियो सामने आने के बाद आन्दोलन के सेकुलर नहीं होने का भंडा फूट गया| फिलहाल नहीं कह सकते कि सेकुलर जमात का यह भ्रम दूर हुआ या नहीं कि मुसलमान तो सेकुलर है पर हिन्दू साम्प्रदायिक है।

सेकुलर जमात का वह मकसद पूरा नहीं हो सका कि 1974 जैसा जेपी आन्दोलन बन जाए। इस की बड़ी वजह यह है कि 2014 के बाद भारत बदला है। हिन्दुओं को समझ आने लगा है कि सेकुलरिज्म , संविधान, लोकतंत्र के नाम पर कैसे उसे इमोशनल ब्लैकमेल किया जाता रहा है| उन्हें समझ आ गया है कि सेकुलर शब्द का इस्तेमाल उन्हीं के खिलाफ किया जाता था। इसलिए सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दू अब उतने मुखर नहीं रहे , जितने 2014 से पहले हुआ करते थे। जैसे जैसे धरने का मकसद बेनकाब हुआ शाहीन बाग को समर्थन देने वाले हिन्दुओं की तादाद लगातार घटती चली गई।

नतीजा यह निकला है कि सेकुलरिज्म के नाम पर कुछ फ़िल्मी मसखरे ही मुस्लिम आन्दोलन में शामिल हुए| बाकी तो देश भर में चल रहे धरनों में काले बुर्के ही दिखाई देते हैं| मुस्लिम औरतें बुर्के उतार कर धरने पर बैठतीं तो यह भ्रम बना रहता कि यह सेकुलरिज्म की लड़ाई है , जिसमें सभी धर्मावलम्बी शामिल हैं। पर बुर्कों ने पोल खोल दी कि यह इस्लाम की साम्प्रदायिक लड़ाई है , जो हिन्दुओं के खिलाफ है। धरना स्थल पर राष्ट्र गान और तिरंगे के ढकोसले की पोल गिरफ्तार हो चुके शरजिल इमाम ने तब खोल दीजब उस न वहां भाषण देते हुए कहा कि मुसलमान भारत नेशन को नहीं मानता और उस की पूजा नहीं करता। किसी मुसलमान औरत, मर्द या बच्चे ने शरजिल इमाम को राष्ट्र विरोधी बातें कहने से नहीं रोका , बल्कि तालियां बजी थीं। वह तो तब एनडीटीवी ने आयोजनकर्ताओं की तरफ से एक बयान जारी कर के कहा कि यह कहना ठीक नहीं होगा कि कोई एक व्यक्ति धरने का आयोजक है।

ऐसा नहीं है कि सारे मुसलमान एक तरफ हैं। जैसे आज़ादी की लड़ाई और बंटवारे के समय सारे मुसलमान जिन्ना के साथ नहीं थे , वैसे ही सारे मुसलमान अब भी नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ नही है। ऐसे अनेक मुसलमान हैं जो धरने पर बैठे लोगों को जाहिल कहते हैं , वे सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों से अपनी बात कह रहे हैं।

शाहीन बाग़ का धरना मुसलमानों की उस नाराजगी का इजहार है जो उन में तीन तलाक और धारा 370 खत्म होने से सरकार के खिलाफ बनी हुई है। जिसे अयोध्या पर सुप्रीमकोर्ट के फैसले ने और भडकाया। वे चाहते हैं कि संसद और सुप्रीमकोर्ट उन की इच्छा से काम करें , जैसे पाकिस्तान में होता है। वे भारत के संविधान के अंतर्गत गठित संसद और सुप्रीमकोर्ट को सर्वोच्च नहीं मानते। लेकिन धरना संविधान को बचाने के नाम पर होगा। वे पाकिस्तान से इज्जत बचा कर और इज्जत गवां कर आए दलितों और बोद्धों को भारत की नागरिकता देने वाले क़ानून का विरोध करेंगे, लेकिन धरने पर बाबा साहिब आंबेडकर का फोटो लगाएंगे।

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सिर्फ मुस्लिम नेता नहीं , बल्कि हिन्दू नेता भी धरने का समर्थन करने गए है। लेकिन जब भाजपाई  “ शाहीन बाग में कौन किधर “ का नारा लगा रहे हैं तो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी उन पर साम्प्रदायिक ध्रुविकरण करने का आरोप लगा रहीं हैं । पर अगर यह धरना सेकुलर है तो धरने का विरोध करने से  साम्प्रदायिक ध्रुविकरण कैसे होगा। यानी आप मान रहे हैं कि धरना ही साम्प्रदायिक है। गृहमंत्री अमित शाह ने बाबरपुर की चुनावी सभा में कहा था कि, ‘बटन इतने गुस्से के साथ दबाना कि बटन यहां बाबरपुर में दबे, करंट शाहीन बाग के अंदर लगे। “ शाहीन बाग़ दिल्ली में चुनावी मुद्दा बन चुका है क्योंकि भाजपा के खिलाफ शुरू हुए इस मुस्लिम धरने को कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने खुला समर्थन दिया है।

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