सीएजी के उठाए मुद्दे गंभीर हैं

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद संभवतः पहली बार किसी संवैधानिक संस्था ने सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। आमतौर पर संवैधानिक संस्थाओं का काम सरकार के फैसले पर मुहर लगाने का हो गया है। पर नियंत्रक व महालेखा परीक्षक, सीएजी ने सरकार के कई फैसलों पर सवाल उठाए हैं। सीएजी के उठाए मुद्दे गंभीर हैं और पूरी गंभीरता से इनकी छानबीन होनी चाहिए। सरकार के मंत्रियों के बयानों के आधार पर इन मुद्दों को रफा-दफा करने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। सीएजी ने जो मुद्दे उठाए हैं, वे राष्ट्रीय महत्व के हैं और अगर उनकी ठीक से जांच हुई तो कई चीजें ठीक की जा सकती हैं।

जैसे सीएजी ने पेट्रोलियम क्षेत्र की महारत्न सरकारी कंपनी ओएनजीसी द्वारा दूसरी पेट्रोलियम कंपनी एचपीसीएल की हिस्सेदारी खरीदने पर सवाल उठाया है। असल में केंद्र सरकार ने यह बाजीगरी 2017-18 में की थी। सरकार ने उस समय 72 हजार करोड़ रुपए विनिवेश के जरिए जुटाने का लक्ष्य रखा था। इस लक्ष्य के हिसाब से ही वित्तीय घाटे का लक्ष्य भी तय हुआ था। पर जनवरी 2018 तक सरकारी कंपनियों को बेच कर सरकार सिर्फ 54 हजार करोड़ रुपए ही जुटा पाई थी। उसके सामने 18 हजार करोड़ रुपए और जुटाने की बड़ी चुनौती थी और कोई रास्ता नहीं सूझ रही था। तभी सरकार ने बाजीगरी दिखाते हुए अपनी ही कंपनी की हिस्सेदारी अपनी ही दूसरी कंपनी को बेच दी। इसे वर्टिकल मर्जर का नाम दिया गया।

सीएजी ने अब इस बाजीगरी पर सवाल उठाया है। संसद में पेश की गई रिपोर्ट में इसे आंकड़ों की हेराफेरी माना गया है। सीएजी ने कहा है कि इस सौदे से सरकार को कुछ नहीं मिला है, बल्कि यह सिर्फ संसाधनों का हस्तांतरण है, जो पहले से सार्वजनिक क्षेत्र में मौजूद था। असल में सरकार ने अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए ओएनजीसी की नकदी निकाल कर अपने खाते में डाल ली थी और बदले में उसे एचपीसीएल की हिस्सेदारी सौंप दी थी।

यह मसला इसलिए गंभीर है क्योंकि पिछले कुछ समय से सरकार ऐसे ही काम कर रही हैं। वह अपनी ही कंपनियों की नकदी को इधर से उधर घुमा रही है, जिसका नुकसान यह हो रहा है कि कैश रिजर्व वाली भारतीय कंपनियों की नकदी भी खत्म होती जा रही है। एचपीसीएल और जीएसपीसी जैसी कंपनियों की खरीद की वजह से ओएनजीसी की स्थिति बिगड़ी है। उसे पहली बार एक तिहाई में नुकसान हुआ है। इसी तरह भारतीय जीवन बीमा निगम, एलआईसी का पैसा भी सरकार ने इधर उधर लगवाया है। आईडीबीआई को दिवालिया होने से बचाने के लिए सरकार ने एलआईसी को उसके शेयर खरीदवा दिए। पिछले दिनों खबर आई थी कि दिवालिया होने की कगार पर पहुंचे एस बैंक में भी एलआईसी ने चार फीसदी से ज्यादा शेयर खरीदे। सो, वर्टिकल मर्जर की बाजीगरी और कैश रिजर्व वाली कंपनियों के पैसे दिवालिया कंपनियों में लगाने की प्रवृत्ति पर रोक जरूरी है।

इसी तरह सीएजी ने जीएसटी कंपनसेशनस सेस यानी राज्यों को मुआवजा देने के लिए लगाए गए उपकर के पैसे भारत सरकार की संचित निधि में रखने का मुद्दा भी उठाया है। लगातार दो वित्तीय वर्षों में सरकार ने कोई 47 हजार करोड़ रुपए संचित निधि में रखे थे। सरकार का कहना है को थोड़े समय के लिए मुआवजा उपकर को संचित निधि में रखना गलत नहीं है। पर सरकार के इस एक बयान को सही मान कर इस पर उठाए गए सवालों को दरकिनार करना ठीक नहीं है। आखिर सरकार इसी कंपनसेशन सेस की वसूली कम बता कर राज्यों को हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर रही है। अगर सरकार इस उपकर के पैसे को संचित निधि में रख सकती है और उसका इस्तेमाल वित्तीय घाटा कम दिखाने के लिए कर सकती है तो सरकार संचित निधि से राज्यों को मुआवजा भी दे सकती है। इस मामले में स्पष्टता बहुत जरूरी है ताकि आगे के लिए मिसाल बन सके।

सीएजी ने एक और अहम मसला राफेल लड़ाकू विमान के ऑफसेट करार का उठाया है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक राफेल बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी दासो ने ऑफसेस करार की शर्तों का पालन नहीं किया है। ऑफसेट करार की शर्तों के मुताबिक कंपनी को टेक ट्रांसफर का काम 23 सितंबर 2019 तक होना था, जो 23 सितंबर 2020 तक भी नहीं हो पाया है। यह गंभीर मसला है। आखिर सरकार बहुत महंगी कीमत देकर राफेल विमान खरीद रही है। इससे जुड़ा एक और गंभीर मसला अभी सामने आया है। ध्यान रहे ऑफसेट करार अनिल अंबानी की कंपनी को मिला है और अनिल अंबानी ने पिछले दिनों लंदन की एक अदालत से कहा है कि वे दिवालिया हो गए हैं और उनके पास अपना खर्च चलाने के पैसे भी नहीं है। उन्होंने कहा है कि उनका खर्च उनके घर वाले चला रहे हैं और उन्होंने पत्नी के जेवर बेच कर वकीलों की फीस दी है। इस बीच यह भी खबर आई है कि उनको कर्ज देने वाली चीन की कंपनियां कार्रवाई की तैयारी में हैं। सोचें, ऐसी कंपनी राफेल लड़ाकू विमान के ऑफसेट करार को कैसे पूरा कर पाएगी?

इसके अलावा सीएजी ने दो राज्य सरकारों के कामों को लेकर भी सवाल उठाया है। गुजरात में स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा आयुष मंत्रालय की योजनाओं को लागू करने में गंभीर खामियां पकड़ी गई हैं। रुपए-पैसे की गड़बड़ी से इतर यह आम लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मसला है। इसी तरह सीएजी ने जम्मू कश्मीर में पीडीपी और भाजपा की सरकार के समय हजारों करोड़ रुपए के गलत इस्तेमाल का मसला भी उठाया है। पिछले सीएजी राजीव महर्षि की देखरेख में बनाई गई इस रिपोर्ट में इधऱ उधर के खर्च में 10 हजार करोड़ रुपए दिखाए गए हैं, जिनमें सीएजी को गड़बड़ी दिख रही है। ये सारे गंभीर मामले हैं, जिनकी विस्तार से पारदर्शी तरीके से जांच की जानी चाहिए।

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