मोदी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा

राहुल गांधी ने पिछले दिनों एक ट्विट में लिखा था कि हर राष्ट्र के जीवन में एक समय ऐसा आता है, जब उसके नेतृत्व की परीक्षा होती है। राष्ट्र के साथ साथ ऐसा समय राज्यों के जीवन में भी आता है। कोई भी त्रासदी चाहे मानव निर्मित हो या प्राकृतिक हो, उस समय नेतृत्व की असली परीक्षा होती है। उसी समय देश की सामूहिक चेतना और नागरिकों के आचरण की भी परीक्षा होती है। भारत इस समय ऐसे ही समय से गुजर रहा है।यह समय भारत के नेतृत्व की परीक्षा का समय है और साथ ही नागरिकों के आचरण की भी परीक्षा हो रही है। ऐसे समय में नतीजों से ज्यादा अहम यह होता है कि नेतृत्व और नागरिकों ने संकट का सामना कैसे किया।

यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि थोड़े समय पहले तक तो सरकार इस संकट को लेकर गंभीर नहीं थी या इसकी भयावहता का अंदाजा नहीं लगा पा रही थी। अगर सरकार को इसकी भयावहता का अंदाजा होता तो 19 मार्च तक भारत से मास्क और दूसरे जरूरी चिकित्सा उपकरणों का निर्यात नहीं हो रहा होता। पूरी दुनिया में इस वायरस के फैल जाने, विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से आपदा घोषित कर दिए जाने और दुनिया के लगभग सभी देशों के जरूरी चिकित्सा उपकरणों को निर्यात पर पाबंदी लगा देने के बाद तक भारत से निर्यात होता रहा। बहरहाल, अब सरकार गंभीर है और इसका अहसास सोमवार को तब हुआ, जब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों को फटकार लगाई और ट्विट करके राज्य सरकारों से कहा कि वे इसे गंभीरता से लागू कराएं। प्रधानमंत्री की फटकार के बाद सरकारों ने सख्ती शुरू की। यह ध्यान रखने की बात है कि इस वायरस के इलाज से ज्यादा कारगर उपाय बचाव है। अगर संक्रमण को फैलने से रोक दिया गया तो एक झटके में समूचा संकट खत्म हो जाएगा।

फिर न तो अलग से अस्पतालों की जरूरत पड़ेगी, न अतिरिक्त डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत होगी और न चिकित्सा उपकरणों की चिंता करनी होगी। ध्यान रहे अगर संक्रमण फैला तो भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की सारी कमियां उजागर हो जाएंगी। लोगों के जानमाल का तो नुकसान होगा ही महाशक्ति बनने की ओर बढ़ रहे भारत की असलियत भी दुनिया के सामने आएगी।ध्यान रहे दुनिया में सबसे अच्छी स्वास्थ्य सेवा अमेरिका और यूरोपीय देशों में है पर वे भी इस वायरस के संक्रमण का सामना नहीं कर पा रहे हैं। इसका एकमात्र कारण यह है कि उन्होंने समय रहते इससे मुकाबले की रणनीति नहीं बनाई या इस संकट की भयावहता का अंदाजा नहीं लगा पाए। वायरस का संक्रमण शुरू हो जाने तक यूरोपीय देशों ने इसका संक्रमण रोकने का प्रयास नहीं किया। वे इस भरोसे रहे कि उनके पास विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवा है, वे कोई तीसरी दुनिया के देश नहीं हैं, इसका खामियाजा वे आज भुगत रहे हैं।

भारत की स्थिति इन सब देशों से बिल्कुल अलग है। यहां चीन की तरह एक पार्टी की तानाशाही नहीं है। हां, उसकी तरह बहुत बड़ी आबादी जरूर है। यहां अमेरिका व यूरोपीय देशों की तरह विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवा भी नहीं है। इसलिए असली परीक्षा भारत सरकार की होने वाली है। अपने सीमित संसाधनों में कैसे सरकार इस संकट का मुकाबला करती है, अपने नागरिकों को बचाती है, अपनी आर्थिकी को पूरी तरह से बरबाद होने से रोकती है, यह सब अगले कुछ दिनों में पता चलेगा। असल में यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली बड़ी परीक्षा है। इससे पहले भी उनके छह साल के कार्यकाल में देश कई बार मुश्किलों से घिरा। नोटबंदी की त्रासदी हुई पर वह खुद मोदी सरकार की बनाई हुई थी। जीएसटी का संकट आया पर उसे भी खुद सरकार ने धूमधड़ाके से लागू किया था। लॉब लिंचिंग की घटनाएं हुई हैं उसमें भी सत्तारूढ़ दल की विचारधारा से जुड़े लोगों के शामिल होने की खबरें आईं। नागरिकता कानून की वजह से सामाजिक विभाजन की खाई चौड़ी हुई पर वह भी सरकार का अपना पैदा किया हुआ संकट है। इसलिए इन तमाम संकटों के बारे में सरकार को पता था और इससे निपटने का अच्छा या बुरा उपाय भी था।

पर कोरोना वायरस का संकट इस सरकार का पैदा किया हुआ नहीं है और न इसका असर बाकी संकटों की तरह सीमित है। यह संकट वैश्विक है और इसके बारे में भारत सरकार तो क्या किसी को कुछ भी पता नहीं है। तभी इससे मुकाबले के लिए एक साथ सारे उपाय करने हैं। जांच का दायरा बढ़ा कर संदिग्धों की पहचान करनी है। उन्हें आइसोलेशन में रखने की जरूरत है। जो पॉजिटिव पाए गए हैं उनको क्वरैंटाइन करना है और इलाज की व्यवस्था करनी है। उनके लिए वेंटिलेटर और आईसीयू में बेड की पहली जरूरत है। नागरिकों के बीच व्यापक संक्रमण न हो इसके लिए लोगों को घरों में पूरी तरह से बंद करने की जरूरत है। भारत में रविवार से पहले तक आधे अधूरे तरीके से यह सब काम हुआ है।

पर अब आधे अधूरे उपायों से कुछ नहीं होना है। सरकार को अपनी राजनीतिक इच्छा शक्ति दिखानी है। लोगों को वास्तविक खतरे के बारे में बताना है और साथ ही भरोसा भी दिलाना है कि सरकार इसे संभालने में सक्षम है। अपने सीमित साधनों के अधिकतम इस्तेमाल से संकट पर काबू पाना है। प्रधानमंत्री को अपना प्रेरणादायक नेतृत्व भी दिखाना है और प्रशासकीय क्षमता भी साबित करनी है। गुजरात के भुज में आए भूकंप को उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री बहुत शानदार तरीके से संभाला था। उसी तरह से कोरोना वायरस के संकट को भी संभालना है। आजाद भारत में संभवतः पहली बार स्वास्थ्य का इतना बड़ा मुद्दा बना है। इस संकट के समय जो कमियां जाहिर होंगी उन्हें दूर करने का जिम्मा भी सरकार के ऊपर होगा।

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