‘नाथ’ के जश्न में ‘खलल’ हनी का बढ़ता ‘दखल’... - Naya India
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‘नाथ’ के जश्न में ‘खलल’ हनी का बढ़ता ‘दखल’…

प्रदेश कांग्रेस जिसकी कमान खुद मुख्यमंत्री कमलनाथ के पास है। उनके ही जन्मदिन पर इस विज्ञापन के जरिए सांसद से मुख्यमंत्री तक के सफर की यादें ताजा की गई हैं। विज्ञापन के जरिए कमलनाथ को धैर्यशील नेता बताया गया।

तो जो बातें उन्हें बेहद खास बनाती उनका लेखा-जोखा सामने रखकर कमलनाथ के धैर्य की परीक्षा भी ले ली गई। 9 बार के लोकसभा सांसद कमलनाथ को 1996 में किसने हराया यह भी बता दिया गया।

चुनाव मैदान में पटकनी देने वाले सुंदरलाल पटवा से भी अवगत कराया गया। यह भी याद दिलाया गया कि राजनीति में कमलनाथ संजय गांधी से दोस्ती के कारण आए और इंदिरा गांधी उन्हें अपना तीसरा बेटा मानती थीं। आपातकाल की याद ताजा कर यह भी विज्ञापन के जरिए प्रचारित किया गया कि कमलनाथ को आखिर तिहाड़ जेल क्यों जाना पड़ा था।

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मध्यप्रदेश में 15 साल का कांग्रेस का वनवास खत्म करने का श्रेय कमलनाथ को दिया गया। जिन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया-दिग्विजय सिंह के साथ मिलकर शिवराज का चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का सपना तोड़ दिया, जो कांग्रेस हमेशा फैसले हाईकमान पर छोड़ती और श्रेय राष्ट्रीय नेतृत्व को देती, इस विज्ञापन के जरिए इस विशेष मौके पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने ना तो सोनिया गांधी और ना ही राहुल गांधी को मध्यप्रदेश की सत्ता में लौटाने का श्रेय दिया।

बात यहीं खत्म नहीं होती। याद दिलाया गया कि कमलनाथ इससे पहले 1993 में क्यों मुख्यमंत्री बनने से चूक गए थे। विज्ञापन के जरिए बताया गया कि उस वक्त अर्जुन सिंह ने दिग्विजय सिंह का नाम आगे कर दिया था। लेकिन 25 साल बाद दिग्विजय सिंह के समर्थन के बाद कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। इस विज्ञापन से जिस तरह प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने किनारा किया और गैरजरूरी बताया।

वो यह बताने के लिए काफी है कि जन्मदिन विशेष पर कमलनाथ के बारे में वह बातें जो बनाती हैं उन्हें बेहद खास, खुद कांग्रेस को पूरी तरह रास नहीं आई। प्रदेश कांग्रेस में ही प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जिम्मेदार नेताओं की मौजूदगी में जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने अपनी ओर से विवाद को नहीं बढ़ने देने की पूरी कोशिश की। बावजूद इसके यह सवाल मायने रखता है कि आखिर यह स्थिति निर्मित क्यों हुई। इस चूक के लिए जिम्मेदार कौन है। इससे पहले भी दिग्विजय सिंह के प्रदेश अध्यक्ष रहते तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा को लेकर भी उस वक्त संगठन का एक विज्ञापन विवाद का विषय बन चुका है।

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कमलनाथ जिस प्रदेश कांग्रेस ने ये विज्ञापन जारी किया उसके अध्यक्ष हैं। जिसने मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी छवि में निखार लाने की बजाय विवादित बना दिया। मामला प्रदेश अध्यक्ष नहीं, मुख्यमंत्री से जुड़ा है।  वो भी जब सरकार 11 माह पूरे कर रही। खुद मुख्यमंत्री का जन्मदिन और कमलनाथ मध्यप्रदेश की सीमा से बाहर तब प्रदेश कांग्रेस के विज्ञापन को लेकर बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि किसने इस विज्ञापन का भुगतान किया।

किसकी अनुमति से यह जारी हुआ और किसके कहने पर इसकी डिजाइन को अंतिम रूप दिया गया। सोनिया गांधी से लेकर राहुल, प्रियंका, दीपक बावरिया, अजय सिंह, अरुण यादव, कांतिलाल भूरिया, दिग्विजय सिंह, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी और जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा की फोटो के साथ प्रदेश के आठ दूसरे नेताओं की फोटो भी इसमें चस्पा की गई।

लेकिन प्रदेश कांग्रेस के मीडिया सेल की अध्यक्ष शोभा ओझा से लेकर कांग्रेस के अनुषांगिक संगठनों चाहे फिर वो महिला, कांग्रेस, यूथ कांग्रेस, एनएसयूआई, सेवादल ही क्यों ना हों। जो संगठन की मजबूत कड़ी माने जाते। उनके अध्यक्षों की फोटो तक इसमें नहीं है। जबकि मीडिया सेल और संगठन से जुड़े गुट विशेष के नेता इसका हिस्सा बनाए गए तो क्या इसे कांग्रेस की गुटबाजी का नतीजा माना जाए

या फिर मुख्यमंत्री कमलनाथ की ब्रांडिंग पर पैनी नजर रखने वाले माध्यम और जनसंपर्क से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय और उनके निवास से आगे प्रदेश कांग्रेस के जिम्मेदार नेता-अधिकारी के बीच तालमेल के अभाव के कारण विवाद की यह स्थिति निर्मित हुई। तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि विज्ञापन में यदि दर्शाया जा रहा है कि मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी भोपाल के सौजन्य से यह जारी हुआ तो यदि कांग्रेस की यह अधिकृत लाइन नहीं है तो फिर जांच से आगे क्या एफआईआर दर्ज कराने को लेकर कांग्रेस गंभीर होगी।

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क्या कांग्रेस से जुड़े ही नेताओं की गुटबाजी का नतीजा या फिर इसे सरकार से जुड़े लोगों की लापरवाही मानी जाए। आखिर वह कौन है जिन्होंने मुख्यमंत्री कमलनाथ की छवि में बट्टा लगाने की कोशिश की। क्या प्रदेश कांग्रेस द्वारा इस विज्ञापन से किनारा कर लेने से यह विवाद खत्म हो जाएगा या फिर कुछ और नए सवाल खड़े होंगे।

बहुचर्चित हनी ट्रैप कांड जिसकी जांच धीमी और उसकी दिशा पर सवाल खड़े हो रहे थे। कई बार जिसका नेतृत्व बदल दिया गया, एक बार फिर नौकरशाह, नेता और सुंदरियों के बीच रिश्ते और उसकी आड़ में फलफूल रहे कारोबार को फिर हनी ट्रैप ने चर्चा में ला दिया। यह सब कुछ भाजपा सरकार के एक पूर्व मंत्री के कथित वीडियो वायरल होने के कारण सामने आया।

जिसकी पुष्टि होना बाकी है, भाजपा, कांग्रेस हो या फिर उनके नेता, इस मुद्दे पर ज्यादा कुछ कहने से बच रहे हैं। दबी जुबान में भाजपा ने यह कहकर इस विवाद से पल्ला झाड़ लिया कि तथाकथित इस वीडियो में शामिल शख्स फिलहाल भाजपा में नहीं है। ऐसे में विवादित वीडियो की टाइमिंग ही नहीं, उसकी आड़ में सियासी हित साधने की कोशिश मायने रखती है।

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कांग्रेस के जिम्मेदार नेता हनी ट्रैप में भाजपा के जिम्मेदार नेताओं के लिप्त होने का आरोप लगाते रहे। सवाल क्या इस विवादित वीडियो की जांच एजेंसी द्वारा कराई जाएगी। सवाल आखिर इसमें दम है और छापामार कार्रवाई द्वारा यह पुलिस द्वारा जप्त किया गया तो फिर इस समय यह क्यों सामने आया या फिर लाया गया।

क्या इसे जांच एजेंसियों का नेतृत्व बार-बार बदले जाने का नतीजा माना जाए या फिर सियासी संरक्षण के चलते इसे मध्यप्रदेश में उछाला गया और देखा जा रहा है कि इसका किस पर कितना असर होता है और भाजपा और कांग्रेस का रिएक्शन क्या आता है। तो क्या यह पर्दे के पीछे रणनीतिकारों की सोची-समझी स्कि्रप्ट का हिस्सा है।

जो अब अगले चरण में किसी और नेता का वीडियो सामने आएगा या लाया जा सकता है। फिलहाल सीधे इसके जरिए भाजपा को लपेटना आसान नहीं। क्योंकि हनी ट्रैप से जुड़ी जिस महिला के साथ नेता को दिखाया गया। वो भाजपा की सदस्य नहीं है तो क्या इस स्कैंडल में फोकस आने वाले समय में विरोधी भाजपा या उसके नेताओं तक सीमित रहेगा या फिर पार्टी विशेष में पकड़ और मजबूत साबित करने का भी यह एक जरिया बन सकता है।

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सवाल यह भी खड़ा होता है कि इसकी शुरुआत वल्लभ भवन में बैठे यदि अधिकारियों से हुई थी तो क्या अब यह पूरा मामला डायवर्ट होकर एक नई दिशा की ओर आगे बढ़ता हुआ देखा जाएगा। आखिर जांच एजेंसियां वायरल हुए इस विवादित वीडियो को कितनी गंभीरता से लेंगी। इस वीडियो में नजर आने वाले नेता क्या उनका नाम जोड़ने वालों को कानूनी तौर पर सबक सिखाएंगे। फिलहाल नेता द्वारा अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को जिस तरह निशाने पर लेता हुआ दिखाया गया। क्या वह विरोधी कांग्रेस को रास आ रहा है।

इस मामले में भले ही सीधे तौर पर बीजेपी का फिलहाल कोई लेना-देना नहीं हो। लेकिन क्या भविष्य की आशंका और संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए व डैमेज कंट्रोल को लेकर पार्टी कोई रणनीत बनाने को मजबूर होगी। इससे पहले विधायक की सदस्यता का मामला हो या फिर सदन के अंदर विधायकों के पाला बदलने के कारण पार्टी की रणनीति सवालों के घेरे में आ चुकी है।

या फिर बीजेपी कॉन्फिडेंट है। जो यह मान चुकी है कि उनके नेताओं का हनीट्रैप से कोई लेना-देना नहीं। या फिर यह जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की महत्वाकांक्षा या फिर हड़बड़ी और ब्लैकमेलिंग का नतीजा है। जो वायरल हो चुका वीडियो चर्चा में है.. लाख टके का सवाल बात निकली है तो क्या दूर तलक जाएगी।

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