नागरिकता कानून से जटिलताएं बढ़ेंगी

शशांक राय

केंद्र सरकार 1955 के नागरिकता कानून को बदलने जा रही है। जल्दी ही इसका संशोधित कानून अस्तित्व में आ जाएगा। इस बदलाव से भाजपा को क्या राजनीतिक फायदा होगा उसका आकलन बाद में होगा, अभी इसके बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है। भाजपा के नेता जम्मू कश्मीर में भी अनुच्छेद 370 को ज्यादातर प्रावधान हटाने और राज्य को दो हिस्सों में बांटने के फैसले को लेकर बहुत उत्साहित थे। पर महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में इसका बिल्कुल असर नहीं दिखा। इससे भावनात्मक मुद्दों की सीमाएं जाहिर हुईं। उसी तरह यह नहीं कहा जा सकता है कि नागरिकता कानून बदल देने से भाजपा को बहुत बड़ा राजनीतिक फायदा हो जाएगा। उलटे संभव है कि इससे देश के अंदर कई किस्म की जटिलताएं बढ़ जाएं।

केंद्र सरकार इस कानून में बदलाव करके यह प्रावधान करने जा रही है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर भारत में आने वाले सभी गैर मुस्लिम शरणार्थियों को एक से छह साल के अंदर भारत की नागरिकता दी जाएगी। यह संभवतः पहला मौका है, जब सरकार ने धार्मिक आधार पर इस तरह खुलेआम भेदभाव किया है। इस कानून के मसौदे में साफ तौर से लिखा गया है कि मुस्लिम छोड़ कर बाकी सबको भारत की नागरिकता मिल जाएगी। धर्म के आधार पर सरकार का भेदभाव करना समाज में बड़ा विभाजन पैदा करेगा। ऐसा नहीं है कि इसका असर सिर्फ उन लोगों पर होगा, जो इससे सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं। इसका असर पूरे देश के करीब 15 फीसदी मुसलमानों पर होगा। यह कानून राज्य, समाज और सरकार के प्रति उनके व्यवहार को बदलेगा और समाज में दूसरे धर्मों के लोगों के साथ संबंधों को भी प्रभावित करेगा। लंबे समय में इसका बड़ा नुकसान देश की एकता और अखंडता के लिए होगा। धर्म के आधार पर इतने सहज रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान से आए किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता देना देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हो सकता है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी और उसकी सरजमीं से चलने वाले आतंकी संगठन अपने लोगों को भारत भेज सकते हैं। पहले से ही क्षमता से ज्यादा काम कर रहीं भारतीय एजेंसियों के पास न तो इतने साधन हैं और न इतनी दक्षता कि वह हर आदमी की पहचान पूरी तरह से जांच कर उसके सही या गलत होने का फैसला कर सके।

इसकी जटिलताएं तब और बढ़ेंगी, जब सरकार पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लागू करेगी। इसके लिए सभी नागरिकों को सक्षम प्राधिकार के सामने अपनी पहचान साबित करनी होगी। अकेले असम में एनआरसी लागू करना का क्या नतीजा हुआ है यह सबको दिख रहा है। हजारों करोड़ रुपए के खर्च के बाद भी खुद भाजपा उसको गलत बता रही है और खारिज कर रही है। असम की एनआरसी में 19 लाख लोगों के नाम नहीं शामिल हैं। इनमें से आधे हिंदू बताए जा रहे हैं, जो अपनी पहचान नहीं साबित कर पाए। सोचें, जब यह पूरे देश के लिए लागू होगा तब कितने करोड़ लोगों के नाम छूटेंगे!

बहरहाल, सरकार नागरिकता कानून में बदलाव के बाद इसे और जटिल बना रही है। सरकार पूर्वोत्तर के कई राज्यों में और आदिवासी बहुल इलाकों में इसे लागू नहीं करेगी। यानी इस कानून के तहत जिन लोगों को भारत की नागरिकता मिलेगी, वे कुछ निश्चित इलाकों में नहीं बस पाएंगे। सवाल है कि सरकार ने जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 इसलिए खत्म किया क्योंकि इस कानून की वजह से बाहर के लोग वहां जाकर नहीं बस सकते थे, जमीन नहीं खरीद सकते थे, शादी नहीं कर सकते थे। इस भेदभाव को खत्म करने के लिए सरकार ने कहा कि एक देश, एक कानून लागू होगा। अब खुद ही एक देश में कई कानून बना रही है।

इस कानून के तहत नागरिकता हासिल करने वालों को आदिवासी बहुल इलाकों में भी नहीं बसाया जाएगा। इसी वजह से बीजू जनता दल ने इस बिल का समर्थन किया है। इस तरह देश के कई हिस्सों में दो कानून चलेंगे। इससे प्रशासनिक जटिलता पैदा होगी। एक सवाल यह भी है कि सरकार ऐसे लोगों को कहां बसाएगी? क्या शहरों और महानगरों के बाहरी हिस्सों में, जहां अब रह रहे हैं वहीं पर उनको बसा दिया जाएगा? क्या सरकार उनके लिए अलग बस्ती बनाएगी? यह ध्यान रखना होगा कि इस कानून के अमल में आने के बाद पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाइयों का आना बढ़ेगा। सरकार को उसके लिए तैयार रहना होगा। एक जटिलता यह भी होगी कि इन तीन पड़ोसी देशों से आए जो लोग पहले से इन इलाकों में रह रहे हैं उनका क्या होगा? उनको या तो नागरिकता मिल चुकी है या इस कानून के बाद मिलेगी। तो क्या उसके बाद उनको वहां से निकाल दिया जाएगा?

असम सहित पूर्वोत्तर के कई इलाकों में सरकार अपने ही देश के लोगों को परमिट लेकर जाने की व्यवस्था कर रही है। पहले की तरह सीधे जाकर कोई व्यक्ति इन इलाकों में नहीं बस सकता है। ऐसा इन इलाकों का विशिष्ट पहचान बचाए रखने के लिए किया जा रहा है। असल में पूर्वोत्तर के राज्यों में स्थानीय लोगों ने नागरिकता कानून के बहाने बाहर से आकर बसने वाले लोगों के खिलाफ अभियान छेड़ा है। उनको खुश करने और नागरिकता कानून पर उनका समर्थन हासिल करने के लिए सरकार यह व्यवस्था कर रही है। पर इससे देश के अंदर कई देश बन जाएंगे। पहले देश के अंदर एक कश्मीर था, जहां उसका अपना कानून चलता था अब देश के अंदर सात-आठ वैसे राज्य बन जाएंगे। ध्यान रहे पूर्वोत्तर के राज्यों में बड़ी संख्या में बांग्लाभाषी लोग रहते हैं या जाते हैं और उनके बाद भोजपुरी भाषियों की संख्या भी बहुत ज्यादा है। क्या ऐसे सारे लोग वहां से निकाले जाएंगे?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares