ध्यान भटकाने का खेल कब तक?

देश के सामने इस समय सबसे ज्वलंत मुद्दे क्या हैं? सरकार चाहे कुछ भी कहे कोरोना वायरस का संक्रमण इस समय नंबर एक चिंता है। सरकार को भी सब कुछ छोड़ कर इस समय वायरस का संक्रमण रोकने के प्रयास में लगना चाहिए। इसके बाद नंबर दो चिंता चीन की है। यह संकट भी कोरोना वायरस से ही जुड़ा है। चीन ने इस वायरस का संक्रमण दुनिया भर में जान बूझकर फैलाया या फैलने दिया और उसके बाद दुनिया के देशों के साथ किसी न किसी किस्म की लड़ाई में उलझा है। सो, भारत को कोरोना वायरस से निपटने की जैसी चिंता करनी चाहिए वैसी ही चिंता चीन से निपटने की भी करनी चाहिए।

इसके बाद तीसरी चिंता आर्थिकी की है। कोरोना वायरस के संक्रमण और चीन के आक्रामक व्यवहार दोनों का साझा नतीजा यह हुआ है कि भारत की आर्थिकी धड़ाम से गिरी है। चालू वित्त वर्ष में जीडीपी की विकास दर निगेटिव रहने का अनुमान अब लगभग हर जानकार जता रहा है। चौथी समस्या देश के अलग अलग हिस्सों से लौटे मजदूरों की है। वे अपने गांव लौटे हैं, जहां उनके पास रोजगार नहीं है। वे खाली हाथ लौटे हैं इसलिए उनके सामने अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने का संकट है। सरकार की ओर से मुफ्त राशन बांटने की योजना से जरूर मजदूरों को भोजन मिल जा रहा है पर वह पर्याप्त नहीं है।

सो, ये चार ज्वलंत समस्याएं हैं, जिनसे सरकार को निपटना है। पर ऐसा लग रहा है कि सरकार इन समस्याओं से निपटने की बजाय इनको कमतर करके दिखाने या यह साबित करने में लगी है कि ये कोई समस्या नहीं है, सरकार ने इन्हें निपटा दिया। जैसा कि खुद प्रधानमंत्री ने कहा है कि चीन को मुंहतोड़ जवाब मिल गया है और आर्थिकी में ग्रीन शूट्स यानी हरी कोंपलें दिखने लगी हैं। उनको तो लग रहा है कि इसी साल भारत नई उंचाइयों को छू सकता है। मजदूरों की समस्या हल करने का तो ऐसा रास्ता निकला कि उत्तर प्रदेश सरकार ने एक ही दिन में एक करोड़ रोजगार की घोषणा कर दी, जिसे हरी झंडी भी खुद प्रधानमंत्री ने दिखाई। कोरोना को तो सरकार अब कोई चिंता नहीं मान रही है क्योंकि उसने लोगों को इसके साथ रहने के लिए कह दिया है।

यानी जो चार बड़े संकट हैं, ऐतिहासिक हैं और इनमें से एक कोरोना का संकट तो वैश्विक है, जिसे पूरी मानवता पर संकट माना जा रहा है, भारत में उसे संकट के तौर पर देखा भी नहीं जा रहा है। हर दिन 20 हजार मरीज आ रहे हैं और सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार के शीर्षस्थ लोग कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने कोरोना के खिलाफ शानदार लड़ाई लड़ी है और काफी हद तक इसे काबू पा लिया है। असल में कोरोना का मामला हो या चीन का और आर्थिकी का मुद्दा हो या मजदूरों का सरकार एक तरह का भ्रम पैदा कर रही है। वह आम लोगों को आधे अधूरे और सच्चे-झूठे आंकड़ों के सहारे यह समझा रही है कि सब कुछ ठीक है। लोग भी यह मान रहे हैं कि इस भारी संकट के बीच जो बचा हुआ है वह भी बहुत है और वह ‘मोदीजी’ की वजह से है।

विपक्ष इस भ्रम को तोड़ सकता है। विपक्षी पार्टियां इसका प्रयास भी कर रही हैं। मीडिया का पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने के बावजूद सोशल मीडिया के सहारे विपक्ष ने इन मुद्दों पर लोगों को हकीकत बताई है। यह कितना असरदार होगा, यह कहना मुश्किल है। असल में सरकार और सत्तारूढ़ दल पिछले छह साल से विपक्ष और उसके नेताओं की साख बिगाड़ने में लगे हैं। उन्हें इसमें काफी हद तक कामयाबी भी मिली है। उसी रणनीति के तहत इस ऐतिहासिक संकट के समय विपक्ष की साख बिगाड़ने और ध्यान भटकाने की रणनीति पर काम होने लगा है। पूरे देश को इस बहस में लगा दिया गया है कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ एमओयू किया और कांग्रेस ने सरकार में रहते प्रधानमंत्री राहत कोष से राजीव गांधी फाउंडेशन को चंदा दिलाया। पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में से एक अहमद पटेल के घर इसी बीच प्रवर्तन निदेशालय, ईडी की टीम भी भेज दी गई।

इस बात का कोई मतलब नहीं है कि कांग्रेस पार्टी ने 2008 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ साझेदारी बनाने वाला एमओयू किया था। अगर यह कानूनी रूप से गलत है तो कांग्रेस के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। इसी तरह अगर राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने चंदा दिया तो कानूनी रूप से क्या गलत है और क्या इसी चंदे की वजह से आज चीन की फौज सीमा पर भारतीय फौज से लड़ रही है? चिदंबरम ने सही पूछा कि अगर कांग्रेस 20 लाख का चंदा लौटा दे तो क्या चीनी फौज सीमा पर से लौट जाएगी? इसी तरह राजीव गांधी फाउंडेशन को प्रधानमंत्री राहत कोष से चंदा दिए जाने का भी मामला है। अगर वह कानूनी रूप से गलत है तो सरकार मुकदमा दर्ज करे और फाउंडेशन के खिलाफ कार्रवाई करे। लेकिन इसकी बजाय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर सबसे नीचे के कार्यकर्ता तक की बातों से ऐसा लग रहा है कि देश के सामने असली मुद्दा कोरोना, चीन, आर्थिकी या मजदूरों की समस्या नहीं है, बल्कि कांग्रेस का चीन से तालमेल और राजीव गांधी फाउंडेशन का चंदा लेना है।

असलियत यह है कि कांग्रेस का विरोध या उसकी साख खराब करना अब कोई मुद्दा नहीं है। उलटे लगातार उस पर हमला करके भाजपा अपना नुकसान कर रही है। क्योंकि इस बार जो समस्याएं लोगों के सामने हैं वे उन्हें सचमुच में परेशान कर रही हैं। कांग्रेस पर हमला करने से उनका दिल नहीं बहल रहा है। आखिर कितने समय तक लोग अपनी समस्याएं भूल कर कांग्रेस की आलोचना से दिल बहलाएंगे।

2 thoughts on “ध्यान भटकाने का खेल कब तक?

  1. ईवीएम की माया है भारतीय संसद को पार्टियों ने बेकार बना दिया है ।

  2. सुशांत कुमार जी बहुत सही विश्लेषण किया है आपने

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