कई मायने में ऐतिहासिक होगा सत्र

संसद का इस बार का सत्र कई मायने में ऐतिहासिक होने वाला है। इसकी ऐतिहासिकता सिर्फ इस बात में नहीं होगी कि यह कोरोना वायरस के संक्रमण के बीच हो रहा है, बल्कि आयोजन के तरीके से लेकर सत्र में होने वाले विधायी कामकाज के लिहाज से भी यह ऐतिहासिक होने वाला है। कोरोना संक्रमण के समय में तो दुनिया के अनेक देशों ने सत्र का आयोजन किया पर वैसा आयोजन कहीं नहीं हुआ, जैसा भारत में होने जा रहा है। दुनिया के ज्यादातर देशों में संसद के सत्र का आयोजन वर्चुअल किया गया। कई जगह शारीरिक रूप से मौजूदगी और वर्चुअल मौजूदगी दोनों तरह से किया गया।

यानी कुछ लोग संसद के अंदर मौजूद थे और कुछ लोग अपने घर से ही वीडियो कांफ्रेंस के जरिए सत्र से जुड़े थे। लेकिन भारत में संसद सत्र के आयोजन में वर्चुअल माध्यम को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया। हालांकि ढेरों सरकारी कामकाज और राजनीतिक गतिविधियां वर्चुअल तरीके से ही चल रही हैं पर संसद की कार्यवाही के लिए सभी सदस्यों की मौजूदगी अनिवार्य की गई है। कई समझदार लोगों ने वर्चुअल बैठक की मांग की थी पर उसे खारिज कर दिया गया।

सो, सत्र की पहली ऐतिहासिकता इसमें है कि कोरोना वायरस के संक्रमण के बीच सभी सदस्यों की मौजूदगी में सत्र चलेगा। सभी सांसदों से कहा गया है कि सत्र से पहले कोरोना टेस्टिंग जरूरी है और मास्क लगाना अनिवार्य होगा। हालांकि मार्च में संसद के बजट सत्र के दौरान तृणमूल कांग्रेस के दो सांसद मास्क लगा कर राज्यसभा में चले गए थे तो सभापति ने उनको बहुत सख्त हिदायत देते हुए मास्क उतरवा दिया था। बहरहाल, अब मास्क अनिवार्य है। संसद के लंबे इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि दोनों सदनों के सदस्य दोनों सदनों में बैठेंगे और सदन के अलावा संसद की गैलरी और चेंबर में भी बैठाए जाएंगे। ऐसा सोशल डिस्टेंसिंग सुनिश्चित करने के लिए किया गया है। सांसद कार्यवाही से जुड़े रहें इसके लिए चारों तरफ केबल बिछाए गए हैं और वे मॉनिटर के जरिए कार्यवाही से जुड़ें रहेंगे। इसका मतलब यह है कि सदस्य कई जगह बैठे होंगे और पीठासीन अधिकारी एक जगह होगा। यह भी पहली बार हो रहा है कि एक सदन की कार्यवाही सुबह के सत्र में होगी और दूसरा सदन शाम में चलेगा। यानी दोनों सदन साथ साथ नहीं बैठेंगे।

जब सारे सदस्य साथ में नहीं होंगे तो किसी भी मसले पर विरोध करना मुश्किल होगा। वैसे भी सदन के वेल में जाने की अनुमति नहीं होगी। होती भी तो आसन तो एक ही जगह है, जबकि सांसद कई जगह बैठे होंगे तो आसन के सामने कितने लोग जा सकते थे? सो, विरोध करना या विपक्ष का सत्र के दौरान रियल टाइम में कोऑर्डिनेट करना मुश्किल होगा। पत्रकारों की मौजूदगी भी नाममात्र की रहेगी और संसद का सेंट्रल हॉल भी इस बार सूना रहने वाला है, जहां से राजनीति के बारे में तमाम बातें, खबरें निकलती रही हैं।

इस बार संसद सत्र में प्रश्न काल नहीं होगा। आधे घंटे में सिर्फ तारांकित प्रश्नों की इजाजत है, जिसका मतलब है कि लिखित जवाब सदन के पटल पर रखा जाएगा। कई राज्यों में विधानसभा की कार्यवाही में प्रश्न काल नहीं रखा गया। सो, इस आधार पर भाजपा के नेता लोकसभा की कार्यवाही में प्रश्न काल नहीं होने को जस्टिफाई कर रहे हैं। इस तरह से विपक्ष की भूमिका लगभग पूरी तरह से नगण्य कर दी गई है। जब इतनी मुश्किल से सत्र हो रहा है तो काम रोको प्रस्ताव का तो सवाल ही नहीं उठता है। अल्पकालिक चर्चा और ध्यानाकर्षण की भी गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। इसका मतलब है कि सरकार सिर्फ अपने जरूरी कामकाज निपटाने के लिए सत्र का आयोजन कर रही है।

कायदे से सरकारी कामकाज निपटाने से ज्यादा जरूरी यह था कि संसद के इस बार के सत्र में देश और दुनिया के सामने मौजूद ऐतिहासिक संकटों पर चर्चा हो। संसद के इतिहास में पहले कभी ऐसा संकट नहीं आया है और हो सकता है कि आगे भी इस तरह का संकट नहीं आए। यह ऐतिहासिक संकटों का समय है। कोरोना वायरस की महामारी ने लोगों का जीना दूभर किया है तो अर्थव्यवस्था में ऐसी गिरावट हुई है, जो इससे पहले कभी नहीं हुई। बेरोजगारी का ऐसा चरम भी पहले इस देश ने कभी ऐसा नहीं देखा है। चीन के साथ भारत का तनाव 1962 के युद्ध की तरह हो गया दिख रहा है। पर इस बात की संभावना कम ही दिख रही है कि संसद इन ऐतिहासिक संकटों पर कोई खास बड़ी चर्चा करेगी और देश के 138 करोड़ लोगों में भरोसा पैदा करने वाला कोई मैसेज देगी। इस तरह आम लोगों के जीवन और राष्ट्र की संप्रभुता से जुड़े मसलों पर ऐतिहासिक नाकामी वाला सत्र होने जा रहा है यह।

जहां तक सरकारी कामकाज का सवाल है तो उस लिहाज से भी यह सत्र ऐतिहासिक होने वाला है। इससे पहले शायद ही कभी ऐसा हुआ होगा कि सरकार 11 अध्यादेशों को कानून में बदलेगी। दो सत्रों के बीच सरकार ने 11 अध्यादेश जारी किए हैं। यह एक तथ्य है कि ब्रिटेन के वेस्टमिनिस्टर मॉडल को अपनाने वाले कॉमनवेल्थ देशों में सिर्फ तीन ही देश- भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश हैं, जहां अध्यादेश की व्यवस्था है। बाकी देशों ने इसे छोड़ दिया है और वहां कोई भी कानून बनाने के लिए पहले संसद में जाना होता है। पर भारत में संसद में जाकर भी क्या होना है? सरकार ने तय कर लिया कि कोई कानून बनाना है तो वह कानून बन कर रहेगा। सो, इस सत्र में भी सरकार अपना एजेंडा पूरा करेगी। किसानों और छोटे आढ़तियों को मुश्किल में डालने वाला बिल भी पास होगा तो जरूरी वस्तुओं के बारे में बने कानून को भी बदला जाएगा, सहकारी बैंकों का नियामक भी रिजर्व बैंक को बनाने का कानून भी बनेगा। इस तरह के ज्यादातर कानून आम आदमी, किसानों के हितों पर चोट करेंगे तो संघवाद की पूरी धारणा को खत्म करेंगे।

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