जनता कर्फ्यू से कुछ नहीं सधना!

Must Read

कोरोना वायरस की महामारी ने देश के लोगों को जिन नए शब्दों और अवधारणाओं से परिचित कराया उनमें एक जनता कर्फ्यू भी है। सोमवार को देश में लगाए गए पहले जनता कर्फ्यू की सालगिरह थी। एक साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के लोगों से एक दिन अपने घरों में बंद रहने की अपील की थी और कहा था कि शाम पांच बजे पुलिस की गाड़ियां हूटर बजाएंगी उस समय सबको अपने घरों से बाहर निकल कर ताली और थाली बजानी है। जनता कर्फ्यू और ताली-थाली बजाने जैसे दिखावे से घनघोर विरोध के बावजूद यह कहने में हिचक नहीं है कि 22 मार्च 2020 का दिन अद्भुत था। पूरे दिन देश की सड़कें खाली रहीं। बिना किसी जोर-जबरदस्ती के ऐसा संभवतः पहली बार हुआ था कि लोगों ने अपने को घरों में बंद किया और शाम पांच बजे घरों से निकल कर पांच मिनट तक ताली-थाली बजाते रहे। देश के प्रथम नागरिक से लेकर कतार में खड़े आखिरी आदमी तक बड़ी संख्या में लोगों ने इसमें हिस्सा लिया और जो सक्षम था उसने तस्वीर और वीडियो साझा करके कोरोना रोकने के इस महाअभियान में शामिल होने का सबूत दिया।

पर सवाल है कि उससे क्या हासिल हुआ? ठीक एक साल बाद यह विचार का समय है कि कोरोना वायरस रोकने के नाम पर जो भी प्रयोग हुए उससे क्या हासिल हुआ? जनता कर्फ्यू कोरोना के खिलाफ लड़ाई में जन भागीदारी का एक प्रयोग था। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी लोकप्रियता का इस्तेमाल करके लोगों को इस अभियान में शामिल किया था। लोगों ने उनकी कही बात पर भरोसा किया था। यह माना था कि इस तरह घरों में बंद हो जाने से कोरोना वायरस की चेन टूटेगी और ताली-थाली बजाने से कोरोना भाग जाएगा। जिस दिन ताली-थाली बजाने की घोषणा हुई थी उसी दिन देश में बड़ी संख्या में ऐसे वैज्ञानिक पैदा हो गए थे, जिन्होंने बताया था कि ताली-थाली बजाने से जो शोर उठेगा उसका क्या कॉस्मिक असर होगा और कैसे उससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा और उससे कैसे कोरोना को रोकने में कामयाबी मिलेगी।

इसके दो दिन बाद ही प्रधानमंत्री ने तीन हफ्ते के लॉकडाउन का ऐलान किया। यह दुनिया का सबसे सख्त और सबसे बड़ा लॉकडाउन था। चार घंटे की नोटिस पर 138 करोड़ लोगों के देश को ताले में बंद कर दिया गया। जिस तरह से चार घंटे की नोटिस पर नोटबंदी हुई थी उसी तरह चार घंटे की नोटिस पर देशबंदी हुई थी। हालांकि इसमें नोटबंदी की तरह किसी किस्म की गोपनीयता या सरप्राइज की जरूरत नहीं थी। चार घंटे की नोटिस पर देशबंदी का नतीजा करोड़ों लोगों को भुगतना पड़ा था। जो लोग यात्रा कर रहे थे, ट्रेनों में थे या हवाई अड्डों पर बैठे थे, किसी कारोबार या नौकरी के सिलसिले में शहर से बाहर गए थे, इलाज के लिए किसी और शहर में गए थे, उन सबको बड़ी मुसीबत झेलनी पड़ी। वे 21 दिन के लिए जहां के तहां बंद होकर रह गए।

बहरहाल, जनता कर्फ्यू की सालगिरह के मौके पर यह विचार किया जाना चाहिए कि कोरोना को रोकने के लिए इसके जरिए जन भागीदारी का जो प्रयोग किया गया, उससे क्या हासिल हुआ? क्या लोगों ने जनता कर्फ्यू की भावना को समझा और कोरोना को रोकने में अपनी जिम्मेदारी निभाई? क्या केंद्र व राज्यों की सरकारों और प्रशासन ने इस काम में लोगों की मदद की? अगर वस्तुनिष्ठ तरीके से आकलन करें तो पता चलता है कि अपनी अपनी मजबूरियों या अपनी अपनी जरूरतों में आम लोगों और सरकार व प्रशासन सबने इसको फेल करने का काम किया। इसको इस बात से भी समझा जा सकता है कि देश में इस समय कोरोना के बढ़ते मामलों के बारे में एम्स दिल्ली के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने कहा कि बड़ी संख्या में  भीड़ जुटने और लोगों की लापरवाही की वजह से केसेज बढ़ रहे हैं।

जनता कर्फ्यू की भावना या उसका मकसद यह था कि लोगों को आगाह किया जाए, उन्हें सावधान किया जाए और यह समझाया जाए कि कोरोना से लड़ने का यही तरीका है कि लोग दूर-दूर रहें, अपने घरों में रहें, हाथ धोएं, सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें, मास्क लगाएं आदि आदि। लेकिन असल में यह भारत में संभव ही नहीं था। हैरानी इस बात की है कि यह समझने में सरकार को काफी समय लग गया। कायदे से 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा से पहले सरकार को यह पता होना चाहिए था कि इससे बात नहीं बनेगी क्योंकि जिस दिन भारत में लॉकडाउन लगाया गया था उससे 73 दिन पहले चीन के वुहान में हार्ड लॉकडाउन लागू किया गया था और 73 दिन बाद भी जारी था।

अब सवाल है कि जनता कर्फ्यू की भावना क्यों लोगों तक नहीं पहुंची या क्यों कारगर नहीं हुई? इसका कारण यह है कि भारत 138 करोड़ लोगों का विशाल देश है, जिसमें ज्यादातर लोग रोजी-रोटी के लिए रोजमर्रा के कामकाज पर ही आश्रित हैं। उन्हें ज्यादा समय तक घरों में बंद करके नहीं रखा जा सकता था। दूसरे, चीन की तरह भारत में ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है कि लोग घरों में बंद रहें और सबके दरवाजे पर राशन, दवाएं आदि पहुंच जाएं। तीसरे, चीन से उलट भारत में ऐसा लोकतंत्र है, जिसमें हर साल अनेक किस्म के चुनाव होते रहते हैं, जो जन भागीदारी के बगैर संभव ही नहीं है। सोचें, जनता कर्फ्यू की सालगिरह के मौके पर पांच राज्यों में चुनाव चल रहे हैं। एक राज्य में विधानसभा का चुनाव पिछले साल के अंत में हुआ। उससे पहले तेलंगाना, गुजरात, राजस्थान आदि राज्यों में स्थानीय निकायों के चुनाव हुए। सो, कुछ जरूरतें थीं, कुछ मजबूरियां थीं और कुछ व्यवस्था की सीमाएं थीं, जिनकी वजह से शुरू होते ही जनता कर्फ्यू और हार्ड लॉकडाउन का विफल होना तय था। सो, वहीं हुआ और आज फिर देश कोरोना की महामारी के मुहाने पर खड़ा है। जिस दिन जनता कर्फ्यू लगाया गया था उस दिन पूरे देश में 66 नए केस आए थे और कुल केसेज की संख्या तीन सौ के करीब थी। उसकी सालगिरह के मौके पर एक दिन में 47 हजार नए केस आए और देश में कुल केसेज की संख्या एक करोड़ साढ़े 16 लाख के करीब है और एक लाख 60 हजार लोग मर चुके हैं।

- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

साभार - ऐसे भी जानें सत्य

Latest News

‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!

हमें कलियुगी हिंदू मनोविज्ञान की चीर-फाड़, ऑटोप्सी से समझना होगा कि हमने इतने देवी-देवता क्यों तो बनाए हुए हैं...

More Articles Like This