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Wednesday, April 14, 2021
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रो-रोकर राहत हासिल करना!

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यह भारत की त्रासदी है कि लोक कल्याणकारी राज्य होने के बावजूद यहां नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं भी रो रोकर हासिल करनी होती है और किसी संकट के समय राहत हासिल करना तो एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने जैसा काम हो जाता है। जैसे अभी कोरोना वायरस के संकट के समय में हो रहा है।

लोग बीमारी का पता लगाने के लिए टेस्ट कराना चाह रहे हैं पर टेस्ट नहीं हो रहा है, इलाज के लिए अस्पताल में भरती होना चाह रहे हैं पर बेड्स नहीं मिल रही हैं, लोग आर्थिक तंगी से अपने घर लौटना चाह रहे हैं पर उसके लिए साधन नहीं मिल रहे हैं, लोग मेहनत करके रोजी-रोटी कमाना चाह रहे हैं पर उनके लिए रोजगार नहीं है और केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें हर दिन अपनी उपलब्धियां बता रही हैं!

यह कितना अश्लील है कि देश की राजधानी में एक पत्रकार को वीडियो जारी करके बताना पड़ा कि उसका पूरा परिवार कोरोना वायरस से संक्रमित है और उसे इलाज के लिए कहीं जगह नहीं मिल रही है? उस पत्रकार ने बताया कि जिस घर में वह पूरे परिवार के साथ रहता है उसी घर में उसके सास और ससुर दोनों की कोरोना वायरस से मौत हो गई और शव उठाने वाला कोई नहीं आ रहा था। उसी घर में वह पत्रकार, उसकी पत्नी और दो छोटी बेटियां कोरोना से संक्रमित थीं और इलाज नहीं हो रहा था। वह वीडियो और पत्रकार की अपील दिल को दहला देने वाली थी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उसका वीडियो शेयर किया और तब जाकर इधर उधर से राहत पहुंचने लगी और इलाज के लिए ले जाया गया।

यह एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि देश में कोरोना वायरस से चल रही लड़ाई की हकीकत बताने वाली प्रतिनिधि कहानी है। ऐसी कहानियों की भरमार है। दिल्ली में ही एक दूसरी महिला पत्रकार की कहानी मिसाल है। उसके परिवार में छह लोग हैं, जिनमें से तीन को कोरोना वायरस हो गया। उनसे कहा जा रहा है कि दो कमरों के जिस मकान में वे रहते हैं उसमें तीन लोग क्वरैंटाइन हो जाएं और बाकी तीन लोग कहीं और रहने चले जाएं। सोचें, संक्रमित का इलाज नहीं करना है और उनके सीधे संपर्क में आए लोगों को यह कहा जा रहा है कि वे कहीं और जाकर रहें! यह मामला भी सोशल मीडिया में वायरल हुआ तो जाकर राहत मिलने की उम्मीद जगी।

जो पत्रकार हैं या ट्विटर और दूसरे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और किसी बड़े आदमी को टैग करके ट्विट कर दे रहे हैं और राहत मिल जा रही है, उनकी बात तो ठीक पर है, जो ऐसा नहीं कर सकते हैं उनका क्या? जो ट्विटर पर नहीं हैं या जिनकी मुश्किलों को कोई बड़ा नेता शेयर नहीं कर रहा है उनको कैसे राहत हासिल होगी? उनका इलाज कैसे होगा और जांच किस तरह से होगी? क्या सरकार की व्यवस्था ऐसी नहीं होनी चाहिए कि जिसे भी बीमारी का संदेह है उसकी जांच हो और जांच में जिसकी पुष्टि हो रही है उसे समुचित इलाज मिले और यह सहज रूप से हो? इसके बाद दूसरे चरण में इतनी सहजता से यह भी हो कि संक्रमितों के सीधे संपर्क में आए लोगों की पहचान हो और उन्हें क्वरैंटाइन करते हुए उनकी जांच की व्यवस्था हो?

वायरस जब फैलना शुरू हुआ था तब ये सारे काम होते थे। लोगों के टेस्ट भी होते थे और कांटैक्ट ट्रेसिंग भी होती थी यानी पता लगाया जाता था कि संक्रमित व्यक्ति किसके संपर्क मंा आया था। पर जैसे जैसे मामले बढ़ते गए यह पूरी प्रक्रिया सिर के बल खड़ी हो गई। सबको उसके भाग्य और उसकी अपने निजी साधनों के भरोसे छोड़ दिया गया है। हालांकि निजी साधनों के दम पर भी इलाज करा सकना आसान नहीं है। असल में सरकारों ने समझ लिया कि अब संक्रमण सामुदायिक स्तर पर फैलना शुरू हो गया है इसलिए संक्रमितों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाना और उनकी पहचान कर सबकी जांच कराना संभव नहीं है। इसलिए सबने हाथ खड़े कर दिए। अब सरकारें सिर्फ इतना काम कर रही हैं कि हर दिन एक निश्चित संख्या संक्रमितों की बता दे रही है और उन्हें अस्पताल में भरती करती या घर में क्वरैंटाइन करने की सलाह दे देती है। सरकार की ओर से पहले से तय की गई संख्या से ज्यादा अगर मरीज आ जाते हैं या उससे ज्यादा लोगों को संक्रमण हो जाता है, जो कि हो रहा है तो उनको भघवान भरोसे छोड़ा जाता है। उसी में से किसी ने रो-रोकर राहत हासिल कर ली तो ठीक है और नहीं कर सका तो उसकी किस्मत!

यहां ऐसा नहीं है कि कोई बीमार हुआ तो उसकी निश्चित रूप से जांच होगी और निश्चित रूप से इलाज मिलेगा। यह सब संयोग पर निर्भर करता है। आप कहां रहते हैं, आपके पास कितने पैसे हैं, आपकी कितनी पहुंच है और इस तरह की कई दूसरी बातों पर निर्भर करेगा कि आपका इलाज हो पाएगा या नहीं। असल में सरकारों ने संकट की गंभीरता का अंदाजा ही नहीं लगाया। शुरू में थोड़ी सक्रियता जरूर दिखाई गई पर उसकी निरंतरता नहीं बनी रह सकी। सरकारों ने अस्थायी मेडिकल व्यवस्था के बंदोबस्त नहीं किए। निजी अस्पतालों का टेकओवर करके उनमें कोरोना के मरीजों के इलाज की व्यवस्था नहीं बनाई, कोरोना से लड़ने के लिए मेडिकल तैयारियां चुस्त-दुरुस्त बनाने के मकसद से सरकारों ने खजाना नहीं खोला, जिसका नतीजा यह हुआ कि मामले बढ़ते ही सब कुछ बिखर गया।

कोरोना जैसी बीमारी से लड़ने के लिए भारत जैसे देश में, जहां मेडिकल सुविधाएं पहले से बहुत बुरी हैं वहां सिर्फ 15 हजार करोड़ रुपए के एक फंड की घोषणा हुई, जो अगले चार साल में खर्च होने वाली है। सरकार अगर पांच सौ करोड़ रुपए खर्च करती तो और 50 लाख या उससे ज्यादा लोगों की टेस्टिंग हो गई होती। सरकार ने जो सांसद निधि जब्त की है उसी से वेंटिलेटर खरीदे गए होते तो लाखों की संख्या में वेंटिलेटर आ गए होते।

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