खेती से देश और आर्थिकी दोनों बचेंगे!

कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए देश भर में लागू किए गए लॉकडाउन की वजह से आर्थिकी का चक्का पूरी तरह से जाम हैं। अप्रैल और मई के दो महीने सब कुछ ठप्प रहा। जून से केंद्र और राज्यों की सरकारों ने लोगों की जान की चिंता छोड़ कर जहान बचाने की फिक्र में सब कुछ खोल दिया है। पर उससे कुछ हासिल नहीं होना है। लोग दुकानें खोल कर बैठे हैं पर ग्राहक नहीं हैं। उद्योगपति फैक्टरियां खोल कर बैठे हैं पर न मजदूर हैं, न कच्चा माल है और न आगे कहीं से ऑर्डर आता दिख रहा है। छोटे व मझोले उद्यमी अपने बने बनाए माल को बेच कर किसी तरह कर्ज चुकाने की जुगाड़ में हैं पर कहीं से खरीददार नहीं आ रहा है। सोशल मीडिया में चल रहे मजाक की भाषा में कहें तो सिर्फ इतना हुआ है कि अनलॉक-एक से ‘पुरुषों को घर के कामकाज से और बीवी के तानों से मुक्ति मिल गई है’।

आर्थिक संकट के ऐसे दौर में उम्मीद की किरण बहुत कम है। एकाध छोटे-मोटे सेक्टर में थोड़ी तेजी आ सकती है पर मोटे तौर पर हर सेक्टर में मंदी रहने वाली है। ऐसे में सरकार, देश और आम नागरिक सबके बचाव की एक उम्मीद कृषि सेक्टर से दिख रही है। हालांकि पिछले करीब तीन दशक में जान बूझकर खेती को बरबाद किया गया। देश में आर्थिक उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद से ही उन नीतियों में एक अंतर्निहित बात यह थी कि खेती को खत्म करके किसानों को मजदूर बनाना है तभी देश में औद्योगिकरण की रफ्तार तेज होगी या सेवा क्षेत्र तेजी से बढ़ेगा। इस नीति का नतीजा यह हुआ कि खेती लगातार महंगी होती गई, किसानों की बजाय खाद-बीज बनाने वाली कंपनियों को खुले हाथ से सब्सिडी बांटी गई और अंततः छोटे व सीमांत किसानों ने खेती बंद कर दी और खेत मजदूर बन गए।

घटते घटते भारत की सकल घरेलू उत्पादन में कृषि का हिस्सा 15-17 फीसदी तक पहुंच गया। हालांकि इसके बावजूद देश की 50 फीसदी आबादी अब भी खेती-किसानी पर निर्भर है। तभी सवाल है कि क्या कृषि सेक्टर को फिर से सुधार करके इससे देश के ज्यादातर लोगों का जीवन बेहतर किया जा सकता है? और क्या कृषि सेक्टर के सहारे देश की अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने की उम्मीद की जा सकती है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि संकट के इस समय में उम्मीद की किरण कृषि सेक्टर में ही दिख रही है। ऐसा नहीं है कि कोरोना वायरस की वजह से पिछले तीन महीने के संकट में, बल्कि उससे पहले भी जब हर सेक्टर में विकास दर गिर रही थी तब भी कृषि सेक्टर उम्मीद बंधाए हुए थे।

कम से कम तीन आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। पहला आंकड़ा पिछले हफ्ते शुक्रवार को आया, जिसमें पिछले वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही यानी जनवरी-मार्च 2020 का आर्थिक विकास का डाटा बताया गया। इसमें हर कोर सेक्टर में बड़ी गिरावट की खबर आई और इस तिमाही की विकास दर सिर्फ तीन फीसदी रही, जिसकी वजह से पिछले पूरे वित्त वर्ष की जीडीपी की विकास दर गिर कर 4.2 फीसदी रह गई। इसमें भी एकमात्र चमकदार उदाहरण कृषि का है, जिसकी विकास दर 5.9 फीसदी रही। आखिरी तिमाही में विकास दर करीब छह फीसदी की रफ्तार से बढ़ी है और यह मामूली बात नहीं है।

इस आंकड़े के बाद खेती से जुड़ा एक नया आंकड़ा आया है, जो ज्यादा उम्मीद बंधाने वाला है। इस आंकड़े के मुताबिक इस साल मई में 40 लाख टन से ज्यादा खाद बिकी है। पिछले साल मई में 20 लाख टन से थोड़ी ज्यादा खाद की बिक्री हुई थी। यानी पिछले साल मई से सीधे दोगुनी मात्रा में खाद का बिकना इस बात का संकेत है कि कोरोना वायरस से पैदा हुए संकट के बीच देश के किसानों ने खेती की ओर रुख किया है। संभव है कि खरीफ की खेती ज्यादा बड़े इलाके में हो और अगले साल पैदावार भी बहुत बंपर हो। ऐसा मानने का एक कारण यह भी है कि इस साल मई में खाद की जो बिक्री हुई है वह खरीद सीधे किसानों ने की है। हर साल 70 फीसदी खाद डीलर खरीदते हैं, जो तीन महीने तक की उधारी पर खरीददारी करते हैं। इस बार डीलर्स ने सिर्फ 30 फीसदी खरीददारी की है। इसका मतलब बहुत साफ है। इसका अर्थ है कि जिन किसानों ने खेती छोड़ दी थी या जो पहले कम खेती करते थे या जो खेत मजदूर बन कर बाहर कमाने चले गए थे पर अब घर लौटे हैं वे खेती करने जा रहे हैं।

एक तीसरा आंकड़ा देश की मशहूर ऑटोमोबाइल कंपनी के मालिक आनंद महिंद्रा ने ट्विटर पर शेयर किया है। उन्होंने कहा है कि मई के महीने में उनकी कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा ने 24,341 ट्रैक्टर बेचे हैं। इससे पहले एक बड़ी एजेंसी नोमुरा ने अनुमान लगाया था कि बहुत अच्छी स्थिति होने पर 21 हजार ट्रैक्टर बिकेंगे। चूंकि ट्रैक्टर का इस्तेमाल खेती या उससे जुड़े काम के लिए ही होता है इसलिए यह आंकड़ा भी उम्मीद जगाने वाला है कि शहरों और महानगरों से लौटे लोगों की वजह से गांवों, कस्बों और छोटे शहरों के इलाके में खेती-किसानी की वापसी होने वाली है।

असल में पिछले साल मॉनसून अच्छा रहने से खेती में फायदा हुआ। जमीन के नीचे पानी का स्तर ठीक हुआ है और अगर इस साल भी मॉनसून सामान्य रहता है तो स्थिति और बेहतर होगी। सो, अब सब कुछ केंद्र और राज्यों की सरकार के हाथ में है कि वे मंद पड़ी आर्थिकी को ठीक करने के लिए इधर-उधर कर्ज के पैकेज बांट कर बैंकों का पैसा डुबोते हैं या खेती-किसानी पर ध्यान देकर करोड़ों लोगों का जीवन बेहतर बनाते हैं और इसके जरिए आर्थिकी की गाड़ी पर पटरी पर लाते हैं। इसके लिए सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी में बढ़ोतरी एक उपाय नहीं है। किसानों को प्रोत्साहन देना होगा, उनके उत्पादों के लिए बाजार तैयार करना होगा और कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना होगा।

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