युद्ध के अखाड़े में कुर्दों की बलि - Naya India
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युद्ध के अखाड़े में कुर्दों की बलि

उत्तर-पूर्वी सीरिया एक बार फिर बड़े युद्ध का अखाड़ा बन गया है जिसने पश्चिमी दुनिया के कई देशों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इतना ही नहीं, भारत और पाकिस्तान तक तुर्की के पक्ष और विपक्ष में इस मसले पर अपने बयान दे चुके हैं। मामला गंभीर इसलिए होता जा रहा है कि पश्चिम एशिया की राजनीति में सीरिया का यह इलाका महाशिक्तयों के लिए जोरआजाइश के बड़े केंद्र में तब्दील हो चुका है और अमेरिका इसके केंद्र में है। जाहिर है, जब अमेरिका इस विवाद का बड़ा पेंच है और उसके अपने हित हैं तो इस समस्या के सुलझने के आसार दूर-दूर तक नहीं हैं।

तुर्की की सेना ने इन दिनों सीरिया के उत्तर-पूर्व में कुर्द बहुत इलाकों में जिस तरह से ताबड़तोड़ हमले कर रही है और कुर्दों को निशाना बना रही है, उससे गंभीर मानवीय संकट खड़ा हो गया है। बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं और जख्मी हुए हैं। लाखों बेघर हो गए हैं। अगर अमेरिका सीरिया और तुर्की की सीमा से अमेरिकी सैनिकों को हाने का फैसला नहीं करता तो आज शायद नहीं बिगड़ते। ट्रंप चूंकि अगले राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों में लगे हैं और उन्होंने अमेरिकी जनता से वादा किया है कि अफगानिस्तान और सीरिया जैसे देशों से अमेरिकी सैनिकों की वापसी होगी। अफगानिस्तान से तो यह संभव नहीं हो पाया है, लेकिन सीरिया में इस फैसले का असर तुर्की के हमले के रूप में आया है। तुर्की में बीस फीसद के फीसद के आसपास कुर्द आबादी है। तुर्की कुर्दों को आतंकवादी करार देता आया है। दरअसल, इराक, सीरिया और तुर्की के कुर्द बहुत क्षेत्र में रहने वाले कुर्द सुन्नी मुसलमान हैं और लंबे समय से अलग कुर्दिस्तान राष्ट्र के गठन के लिए लड़ रहे हैं।

समय-समय पर कुर्दों को लेकर ट्रंप जो विवादस्पद बयानबाजी करते आए हैं उसने भी आग में घी का काम किया है। ट्रंप ने कुर्दों की वफादारी पर सवाल उठाते हुए यहां तक कह डाला कि इसलामिक स्टेट के साथ लड़ाई में कुर्दों ने अमेरिका का साथ नहीं दिया। हकीकत तो यह है कि इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता को उखाड़ फेंकने में अमेरिका का सबसे ज्यादा साथ तो कुर्दों ने ही दिया। और सीरिया में भी आइएस के लड़ाकों से मुकाबले में अमेरिका के साथ कुर्द ही कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहे हैं। अमेरिका में रिपब्लिकन खुद ट्रंप के इस तरह के बयानों से हैरान हैं। इसलिए मजबूरी में ट्रंप को तुर्की पर प्रतिबंध लगाने की धमकी देनी पड़ी है। कुल मिला कर अमेरिका की कुटिल राजनीति ने कुर्द आबादी को गंभीर संकट में झोंक डाला है।

सीरिया के इस अखाड़े में पाकिस्तान तुर्की के साथ है। इसकी वजह सिर्फ यही है कि कश्मीर के मुद्दे पर तुर्की ने पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया है। लेकिन भारत ने सीरियाई क्षेत्र की संप्रभुता की रक्षा पुरजोर वकालत करते हुए तुर्की के हमलों की कड़ी निंदा की है। बुनियादी सवाल यह है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का झंडा उठाने वाले निर्दोष नागरिकों को क्यों युद्ध की आग में झोंक रहे हैं?

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