भारत में शिक्षा-क्रांति की आवश्यकता : दलाई लामा

हल्की सर्दी में फाऊंटेन लॉन, तीन ओर बाग की हरियाली, प्रातः की धूप, पक्षियों की चहचहाहट। खुले थियेटर में सीढ़ीवत लगी कोई दो सौ साफ, सफेद कुर्सियाँ। इस से सुंदर वातावरण क्या हो! आरंभ में नीला भागवत जी ने वैदिक प्रार्थनाएं गाईं, ‘पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथापः/ स्पर्शी च वायुर्ज्वलितं च तेजः…’। आग्रह के साथ बताया कि वेदों में जीवन-व्यवहार के लिए अनमोल सलाह हैं। उन्हें जानें, गुनें। भैरवी में अथर्व-वेद की एक सारगर्भित प्रार्थना के साथ उन्होंने जल्द अपना भाग समाप्त कर दिया।

फिर दलाई लामा पधारे। दोनों ओर से हाथों के सहारे लिए चलते हुए वे धीरे-धीरे मंच पर आए। पिछले 27 वर्षों में कई बार उन्हें देखा, सुना है। पर पहली बार उन्हें इस तरह सहारे लेकर चलते देख मन भारी हो आया। पर मानसिक सतर्कता यथावत् थी। प्रेमभाव, शिष्टाचार, अधिक से अधिक व्यक्तियों से मिलना, कार्यक्रम विवरण को ध्यान से पढ़ना। फिर मंच पर कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. कपिल कपूर, विशिष्ट अतिथि विनय सहस्त्रबुद्धे, आदि आमंत्रित किए गए।

तेंजिन ग्यात्सो और कपिल कपूर, पहली बार साथ सुनने का अवसर। एक 84, दूसरे 80 वर्ष के। ऐसे अनूठे मनीषियों का कितना कम उपयोग हो पाया! सोच कर आश्चर्य होता है। कपिला वात्स्यायन को नहीं दिख, कुछ चिंता भी हुई। दलाई लामा के साथ-साथ इस स्थान से भी उन का गहरा संबंध हैं। शिक्षा, संस्कृति, और वैदेशिक संबंधों के क्षेत्र में ऐसे अनूठे ज्ञानियों का मार्गदर्शन लेकर भारत में कितना कुछ हो सकता था! पर गत सौ सालों से ऐसी परंपरा बन गई कि राजनीतिक नेताओं ने स्वयं को ही प्रत्येक विषय का ज्ञानी मान लिया – और इसलिए, सच्चे ज्ञानियों की खुली उपेक्षा, बल्कि जब-तब अवमानना भी की। फलतः शिक्षा-संस्कृति के क्षेत्र मूल अर्थ में बिगड़ते चले गए। शिक्षा दस्तावेजों का क्रमशः हल्के, व्यवसायी और फूहड़ तक होता जाना इस का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

दलाई लामा अपनी ट्रेड-मार्क मजाकिया शैली में शुरू होते हैं, ‘मैं अपनी सारी शक्ति (माथे का संकेत करते हुए) इस में लगाता हूँ। घुटनों पर नहीं, जो कमजोर हो रहे हैं।’ और ‘पुराने चेहरों को देखता हूँ कि बूढ़े हो रहे हैं, तब मुझे लगता है कि मैं भी बूढ़ा हो गया होऊँगा।’ कह कर हँसते हैं। फिर एक के बाद कई गंभीर संदेश: आभास और यथार्थ के बीच गहरी खाई है, आभासी भ्रम से ही अधिकांश विनाशक भावनाएं उत्पन्न होती हैं। सभी धर्म एक मूल्य पर बल देते हैं, जो है प्रेम। सुनकर मन में प्रश्न उठा क्या इस्लाम में भी यही मूल्य है? कहाँ, किस सिद्धांत या व्यवहार में? पर, कौन जाने, दलाई लामा राजनीतिक व्यक्ति भी तो हैं। या फिर, अनेक साधु-संतों की तरह उन्होंने भी इस्लाम के बारे में एक बनी-बनाई नीति रखी हुई हो…। जो हो, स्वामी विवेकानन्द, श्रीअरविन्द, टैगोर से लेकर रामस्वरूप, निराला, अज्ञेय और कपिल कपूर तक… तमाम ज्ञानियों के विपरीत दलाई लामा की यह बात गले नहीं उतरती। हालाँकि, आगे वे कहते हैं कि मुस्लिम केवल एक धर्म, एक ही किताब, आदि की जिद करते हैं जिस से सामाजिक सहजता पर असर पड़ता है।

किन्तु, सबसे अधिक दलाई लामा शिक्षा में प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा को जोड़ने पर बल देते हैं। व्यक्ति, समाज और विश्व का कल्याण इसी में है। आधुनिक भारत को प्राचीन भारत की शिक्षा परंपरा से सीख लेनी चाहिए। भारत में ही संभावना है कि आधुनिक जीवन का प्राचीन ज्ञान से सामंजस्य करके विश्व को दिखा सके। हमें विपश्यना का, अपने कार्य और चिंतन का ध्यानपूर्वक विश्लेषण करने का अभ्यास करना चाहिए। धर्म के दुरुपयोग से विश्व में जहाँ तहाँ शिया-सुन्नी, मुस्लिम-बौद्ध, मुस्लिम-ईसाई झगड़े हो रहे हैं (इन सभी उदाहरणों मे क्या समान है?)। इन सब की दवा मनुष्य के भीतर जन्म से ही रहती हैः आंतरिक मूल्य, करुणा। सब से सच्ची करुणा अपने शत्रुओं के प्रति ही हो सकती है। (क्या यह व्यवस्था राजनीतिक, संगठित, शत्रु-मतवादियों के लिए भी सही है? यदि हाँ, तो इस का प्रमाण क्या है?)। शत्रु अपने भय, क्रोध, ईर्ष्या से हिंसा करते हैं, मगर वे भी खुशी चाहते हैं। हम में एकत्व भावना होनी चाहिए।

वैज्ञानिकों ने अभी तक मनुष्य के आंतर जगत पर ध्यान नहीं दिया, केवल बाहरी जगत पर लगे रहे। अब उन्हें यह कमी महसूस होने लगी है। कुछ वैज्ञानिक चिंतन, ध्यान करने लगे हैं। मॉस्को विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों ने खोज की है कि कुछ साधुओं की देह मृत्यु के बाद भी दो-तीन सप्ताह तक क्यों नहीं खराब होती? क्या यह उन साधुओं का मस्तिष्क तय करता है? प्राचीन भारतीय ज्ञान में इस का संकेत है। आंतरिक शान्ति ही शारीरिक स्वास्थ्य और आयु तक को निर्धारित करती है। एकाएक दलाई लामा समापन कर देते हैं, हँसते हुए कि सामने श्रोताओं के ‘सिर पर धूप तेज हो रही है’, इसलिए उन्हें अधिक कष्ट देना उचित नहीं। पर शायद वे थक गए हैं, बैठे हुए भी अधिक बोलना संभव नहीं।

फिर प्रश्नोत्तर। कार्यक्रम संचालन कर रहे प्रो. मकरंद परांजपे ने लिखित प्रश्न एकत्र कराए हैं। बहुतेरे प्रश्न हैं। आश्चर्य कि उन में राजनीतिक एक भी नहीं! यानी चीन-तिब्बत मुद्दे पर। जबकि दलाई लामा ने संकेत किया था, कि वे भड़काऊ प्रश्नों के लिए तैयार हैं, और जम कर उत्तर देंगे। परन्तु प्रश्न पर्यावरण, शिक्षा, संस्कृति, आदि से संबंधित हैं। दलाई लामा ने प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा को आधुनिक शिक्षा में जोड़ने का आग्रह कई बार किया। विनय सहस्त्रबुद्धे ने भी इसे सुना होगा। क्या वे इस बात का महत्व नहीं समझते? यदि समझते हैं, तो कुछ करेंगे? दलाई लामा कहते हैं कि किसी बात को विश्वास के भरोसे मत मानो। यही बुद्ध ने भी कहा था। नालंदा के बौद्ध ज्ञानियों ने स्वयं भगवान बुद्ध की कुछ बात ठुकरा दी थी!

हम में कोई भेद नहीं है, ‘वी आर ऑल द सेम’, दलाई लामा का यह वाक्य मैंने कई बार सुना है, ‘नो बैरियर’। सदैव अपने को एक मनुष्य समझो। तिब्बती, भारतीय, दलाई लामा, आदि नहीं। अपने को यह या वह तुर्रम खाँ समझने की मूर्खता में ऊर्जा व्यर्थ नष्ट होती है। यदि आंतरिक सौदर्य नहीं, तो चेहरे पर प्रसाधित सौंदर्य का कोई मूल्य नहीं। शिक्षा की उपेक्षा असंख्य गड़बड़ियों का कारण है। केवल भौतिक सुविधाओं की चिंता होती रही है। अभ्यांतर की शान्ति, मूल्यों को शिक्षा में जोड़ लिया जाए, तो दो-तीन दशक में ही सुपरिणाम मिलने लगेंगे। अतः भारत को एक प्रकार की शिक्षा-क्रांति की आवश्यकता है। अहिंसा, करुणा, प्राचीन भारतीय ज्ञान का मेल शिक्षा से होना जरूरी है। मुस्लिम एक खास मतवाद पर अड़े हैं, मगर भारतीय मुस्लिम कुछ भिन्न हैं, उन में उदारता है। इसे प्रोत्साहन मिलना चाहिए। जिसे हिन्दू आत्मा कहते हैं, उसी को बौद्ध आंतरिक चेतना कहते हैं। वीर्य और रज के मिल जाने से ही जीवन की उत्पत्ति नहीं होती। कोई तीसरा तत्व भी जरूरी है, एक नए जीवन के अस्तित्व में आने के लिए। वह क्या है? वैज्ञानिक अनिश्चित हैं। पुनर्जन्म का सिद्धांत इस की व्याख्या करता है। इस भौतिक शरीर के अतिरिक्त एक आत्म-तत्व है। वही तीसरी शक्ति है।

लंबे प्रश्नोत्तर के बाद अध्यक्ष रूप में प्रो. कपूर के बोलने-सुनने के लिए वातावरण कुछ खास नहीं रहा। जिस पर दलाई लामा ने बार-बार बल दिया, वह प्रो. कपूर की विशिष्ट विद्वता का क्षेत्र है। वे कहते हैं कि हम ने अपना ज्ञान छोड़ दिया, जिसे तिब्बतियों ने काफी बचाया। वह प्राचीन ज्ञान गीता के सोलहवें अध्याय में ‘दैवी सम्पदा’ के रूप में सुलभ है। वही सार्वभौमिक नैतिक-मूल्य हैं, जो व्याख्यान का विषय था। मनुष्य जब उस संपदा की उपेक्षा करके अपने सहज ऋत की उपेक्षा करता है, तो पागल होने लगता है, समाज विकृत हो जाता है। चरक संहिता में, बौद्ध, जैन ज्ञानियों ने, गुरू नानक ने, भारत के सभी ज्ञानियों ने इस का ध्यान दिलाया है। उन्होंने नए मूल्य भी जोड़े। जैसे, सिखों में संतोष और सेवा पर विशेष बल दिया गया है। ये मूल्य अभ्यास से जीवन में उतरते हैं। केवल यांत्रिक दुहराने से नहीं। दलाई लामा ने यही कहा है। किन्तु वेद-व्यास से लेकर प्लेटो तक, सभी महान ज्ञानियों ने पाया कि लोग सुन कर भी नहीं सुनते। आचरण नहीं करते।

सभा समाप्त हुई। दलाई लामा पुनः सब से मिलते, आशीर्वाद देते हुए, विदा हो गए। श्रेतागण भी अपने-अपने धाम गए। क्या दोनों ज्ञानियों के संदेश कहीं पहुँचेंगे? राम जी जानें!

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