जम्मू कश्मीर चुनाव के सबक - Naya India
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जम्मू कश्मीर चुनाव के सबक

जम्मू कश्मीर में हुए जिला विकास परिषद यानी डीडीसी चुनाव के नतीजों के कई सबक हैं और साथ ही सवाल भी। इनमें से कुछ सवाल पूरे देश के लिए हैं और कुछ वहां के स्थानीय नागरिकों और पार्टियों के लिए। जैसे सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि इन नतीजों के बाद क्या अब इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन पर सवाल उठाने वाले नेता और बौद्धिक चुप हो जाएंगे? अब बैलेट पेपर से भी भाजपा जीत रही है। हाल में दो चुनाव बैलेट पेपर से हुए, जिनमें भाजपा ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। एक चुनाव ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम का था, जिसमें बैलेट पेपर का इस्तेमाल हुआ था और इस निगम की डेढ़ सौ सीटों में से भाजपा 48 पर जीती। उसने सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति को नाको चने चबवा दिए। भाजपा नेताओं ने क्या प्रचार किया, किस किस्म के भाषण दिए या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए क्या-क्या वह अपनी जगह है। हकीकत यह है कि वोटिंग में भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी बनी और पहले नंबर पर रही तेलंगाना राष्ट्र समिति से सिर्फ सात सीट पीछे रहे। असदुद्दीवन ओवैसी की पार्टी एमआईएम तीसरे नंबर पर चली गई।

बैलेट से दूसरा चुनाव जम्मू कश्मीर में जिला विकास परिषद यानी डीडीसी का हुआ। 280 सदस्यों के लिए हुए इस चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। हालांकि उसे ज्यादातर सीटें जम्मू इलाके में मिली हैं। पर यह ध्यान रखना होगा कि आखिरी बार हुए 2014 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा 25 सीट जीत कर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी तो उसे सारी सीटें जम्मू से ही मिली थीं और तब ईवीएम पर सवाल उठाए गए थे। सो, बिना ईवीएम के बैलेट पेपर से भाजपा का 75 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरना मामूली बात नहीं है। दूसरे, भाजपा का खाता कश्मीर घाटी में भी खुला है। पार्टी तीन सीटें जीतने में कामयाब रही है। इतना ही नहीं भाजपा के प्रति हमदर्दी रखने वाली अल्ताफ बुखारी की जम्मू कश्मीर अपनी पार्टी ने भी 12 सीटें जीती है।

बहरहाल, असली चीज यह है कि अब ईवीएम पर बहस करना या उस पर आरोप लगाना बंद होना चाहिए। ईवीएम हैक करके जनता की इच्छा के विरूद्ध नतीजे हासिल करने की थ्योरी पहले भी बहुत पुख्ता और भरोसा दिलाने वाली नहीं थी। भारत जैसी विविधता वाले लोकतंत्र और विशाल मतदाता समूह वाले लोकतंत्र में जनता की इच्छा के विरोध में मशीन के जरिए नतीजे हासिल करना संभव ही नहीं है। इसमें संदेह नहीं है कि भाजपा की राजनीति विभाजनकारी है, वह सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण कराती है, हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलती है, पाकिस्तान-जिन्ना के नाम पर वोट मांगती है, पैसे के दम पर पार्टियों को तोड़ती है, चुनाव में बेहिसाब पैसा खर्च करती है। इसलिए पार्टियों को इन बातों का विरोध करना चाहिए, इनके मुकाबले अपनी नई राजनीति लानी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में हारने वाली पार्टियां अपनी कमियां स्वीकार करने की बजाय हार का दोष ईवीएम पर मढ़ देती हैं। यहीं कारण है कि पिछले साढ़े छह साल से ज्यादातर चुनावों में हार के बावजूद देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टियों सहित उसकी ज्यादातर सहयोगी पार्टियां अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पा रही हैं।

जिन पार्टियों ने अपनी कमियों को स्वीकार किया, मेहनत करके उन कमियों को दूर करने का प्रयास किया या अपनी असली ताकत को पहचाना उन्होंने हार के बावजूद जबरदस्त वापसी की या जो पहले से सत्ता में थीं वे अपनी सत्ता बचाए रखने में कामयाब रहे। तभी इवीएम पर ठीकरा फोड़ने वाले नेताओं को हर बार हार का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि वे अपनी कमी नहीं समझ पा रहे हैं और ईवीएम के आसान बहाने की आड़ में अपनी कमी छिपा रहे हैं।

बहरहाल, चुनाव नतीजों का एक बड़ा सबक पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती के लिए है। मेहबूबा मुफ्ती ने उम्र का लिहाज करते हुए नेशनल कांफ्रेंस के नेता डॉक्टर फारूक अब्दुल्ला को छह पार्टियों के गुपकर एलायंस का अध्यक्ष चुनवा दिया। फारूक अब्दुल्ला के अध्यक्ष बनने का नतीजा यह हुआ कि कश्मीर घाटी में मतदाताओं में यह मैसेज चला गया कि गुपकर एलायंस का नेतृत्व नेशनल कांफ्रेंस के हाथ में है। बड़ी तस्वीर देखें तो मतदाताओं में यह भी मैसेज है कि विधानसभा चुनाव में गुपकर एलायंस को मौका मिलता है तो कमान नेशनल कांफ्रेंस के हाथ में रहेगी। इसका नेशनल कांफ्रेंस को बड़ा फायदा मिला। डीडीसी के चुनाव में भाजपा के बाद नेशनल कांफ्रेंस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी उससे काफी पीछे रह गई। निश्चित रूप से इस नतीजे के बाद महबूबा मुफ्ती आगे के चुनावों के लिए दूसरी रणनीति बनाएंगी।

गुपकर एलायंस ने डीडीसी चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं और इसी आधार पर पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती का कहना है कि यह चुनाव अनुच्छेद 370 पर जनमत संग्रह था। अगर ऐसा है भी तब भी इसका मतलब है कि अनुच्छेद 370 पर राज्य स्पष्ट रूप से दो हिस्सों में बंटा हुआ है। जम्मू का इलाका, जिसमें सांबा, उधमपुर आदि शामिल हैं वहां सिर्फ भाजपा जीती है और कश्मीर घाटी में राज्य की पुरानी प्रादेशिक पार्टियों की पकड़ पहले की तरह ही मजबूत है। सो, भाजपा और गुपकर एलायंस दोनों ही पार्टियों के लिए मैसेज यह है कि अनुच्छेद 370 हटाने के बाद कुछ नहीं बदला है। जब अनुच्छेद 370 था तब 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में पीडीपी को 28 और भाजपा को 25 सीटें मिली थीं। पीडीपी की सारी सीटें घाटी में थीं और भाजपा की सभी सीटें जम्मू की थीं। यानी जो विभाजन 2014 में था वह जस का तस अब भी मौजूद है।

कांग्रेस पार्टी अकेले चुनाव लड़ी थी। उसने अच्छा किया था जो वह गुपकर एलायंस से अलग हो गई। हालांकि यह इस बात की गारंटी नहीं कि कांग्रेस आगे उनके साथ तालमेल नहीं करेगी। पर कांग्रेस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एलायंस की पार्टियां अनुच्छेद 370 की बहाली का वादा न करें या चीन-पाकिस्तान को भारत से बेहतर न बताएं। बहरहाल, आमने-सामने के इस चुनाव में भी कांग्रेस का प्रदर्शन उम्मीद से अच्छा रहा। उसे 27 सीटें मिलीं, जो उसकी स्थिति को देखते हुए कम नहीं है। इससे यह अंदाजा लग रहा है कि वह अकेले लड़ते हुए अपनी अलग पहचान बनाने की राजनीति कर सकती है।

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