‘देश तोड़ने वालों’ का चुनावी इस्तेमाल! - Naya India
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‘देश तोड़ने वालों’ का चुनावी इस्तेमाल!

तन्मय कुमार : देश तोड़ने का प्रयास करने वालों की जगह दिल्ली की सड़क है या तिहाड़ जेल? जब देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को लग रहा है कि शाहीन बाग में पिछले 52 दिन से चल रहा धरना देश तोड़ने की साजिश का हिस्सा है तो इसमें शामिल लोगों को गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा रहा है? जब प्रधानमंत्री को लग रहा है कि यह संयोग नहीं प्रयोग है तो फिर यह प्रयोग करने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? क्या देश की एकता और अखंडता के लिए प्रतिबद्ध कोई भी व्यक्ति इस प्रयोग को सफल होने देने के बारे में सोच भी सकता है? जब देश के एक केंद्रीय मंत्री को लग रहा है कि अरविंद केजरीवाल आतंकवादी हैं और इस बात के उनके पास पुख्ता सबूत हैं तो फिर उनको गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा रहा है?

ये सवाल अलग अलग तरीके से दिल्ली के चुनाव प्रचार में पूछे जा रहे हैं। भाजपा विरोधी दोनों पार्टियों- कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेता इस बारे में सवाल पूछ रहे हैं। पर उनके सवाल भी राजनीति से प्रेरित ज्यादा दिख रहे हैं। उनमें कोई ठोस प्रतिबद्धता नहीं है। आखिर देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस या दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने भी शाहीन बाग के धरने को खत्म कराने के लिए पिछले डेढ़ महीने से ज्यादा समय से कोई प्रयास नहीं किया। ध्यान रहे दिल्ली में चुनाव की घोषणा होने से पहले ही शाहीन बाग का धरना शुरू हो गया था। तभी अगर सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों मिल कर इसे खत्म कराने या धरने पर बैठे लोगों की शंकाओं को दूर करने का प्रयास करते तो इसे खत्म कराया जा सकता है। पर सबने चुनाव आने का इंतजार किया ताकि इसका अधिकतम लाभ लिया जा सके।

यह भारत का दुर्भाग्य है कि शाहीन बाग जैसी हर घटना या हर मौके का इस्तेमाल राजनीतिक और चुनावी फायदे के लिए किया जाता है। हैरानी इस बात पर ज्यादा है कि देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए सबसे ज्यादा प्रतिबद्धता दिखाने वाले और देशभक्ति पर एकाधिकार रखने वाली पार्टी सत्ता में है और उसके नेता भी आम लोगों को बता रहे हैं कि दिल्ली की सड़कों पर देश तोड़ने की साजिश हो रही है। सोचें, सीमा के उस पार कुछ आतंकवादी देश में घुसने या हमला करने की योजना बना रहे थे और उसका प्रशिक्षण ले रहे थे तब भारत की सरकार ने उसका पता लगा लिया और एयर स्ट्राइक करके आतंकवादियों का शिविर खत्म कर दिया। पूरे लोकसभा चुनाव प्रचार में इस बालाकोट एयर स्ट्राइक के नाम पर वोट मांग गया।

जो सरकार सीमा पार जाकर कार्रवाई कर सकती है और यह दावा कर सकती है कि देश की जनता ने उसे इसी के लिए जनादेश दिया है कि वह देश की सुरक्षा सुनिश्चित करे उस सरकार का मुखिया कहे कि दिल्ली की सड़कों पर बैठ कर कुछ हजार लोग देश को तोड़ने की साजिश कर रहे हैं और एक तरह का प्रयोग कर रहे हैं ताकि देश का भाईचारा खत्म किया जा सके, इसके बावजूद उनके ऊपर कोई कार्रवाई न हो तो इसे क्या कहा जा सकता है? इसका एक ही कारण समझ में आ रहा है कि प्रधानमंत्री और दूसरे मंत्रियों द्वारा शाहीन बाग को लेकर जो कहा जा रहा है वह सही नहीं हो और सिर्फ चुनावी फायदे के लिए ऐसा कहा जा रहा हो। तब भी सवाल है कि क्या चुनावी फायदे के लिए इस तरह के दावे किए जा सकते हैं?

ध्यान रहे पहले भी चुनावों में झूठे दावे किए जाते रहे हैं। महंगाई कम करना, रोजगार देना, विकास करना आदि ऐसे ही दावे हैं, जो इस देश में दशकों से किए जा रहे हैं। विरोधियों पर झूठे आरोप भी लगाए जाते हैं। जैसे कहा जाता है कि अमुक नेता भ्रष्ट है और सरकार बनी तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हालांकि सरकार बनने के बाद किसी पर कार्रवाई नहीं होती है या कार्रवाई का सिर्फ दिखावा होता है। इस तरह के झूठ को देश के लोगों ने चुनावी स्टंट मान कर स्वीकार कर लिया है। देश के लोगों ने मान लिया है कि सब मिले हुए हैं और इनमें से कम खराब को चुनना है। पर देशभक्ति का ऐसा झूठा विमर्श नई बात है और दूसरे मामलों में किए गए झूठे वादों व दावों के मुकाबले ज्यादा खतरनाक है।

असल में शाहीन बाग उसी अंदाज में दिल्ली शहर के दूसरे इलाकों में बैठ कर संशोधित नागरिकता कानून का विरोध करने वालों को देश तोड़ने की साजिश करने वाला बताने के बावजूद उनके ऊपर कार्रवाई न करके केंद्र सरकार ने अपनी साख गंवाई है। यह साफ समझ में आ रहा है कि धरने पर बैठे लोगों को देश विरोधी बता कर इसे चलते रहने देना है ताकि लोगों में गुस्सा बढ़े। यह तो पहनावे, इलाके के नाम आदि के जरिए पहले ही बताया जा चुका है कि धरने पर बैठे लोग कौन हैं। फिर उनको देशद्रोही बताया जा रहा है। इससे ध्रुवीकरण की उम्मीद की जा रही है। यह राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा बहुत खतरनाक स्टंट है, जिसमें स्टंट करने वाले के लिए भी मुश्किल पैदा हो सकती है। अगर इसे देशभक्ति और देशद्रोह का मुद्दा नहीं बनाया गया होता और दिल्ली के आम लोगों की परेशानी के तौर पर देखते हुए सुलझाने का प्रयास किया गया होता तो यह मामला कब का सुलझ गया होता। पर अपने देश की पार्टियों की देशभक्ति यहीं है कि आम लोगों की परेशानी की कीमत पर वोट बैंक की राजनीति चमकाए रखनी है।

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