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बेखौफ लुटेरे, वीआईपी पुलिस

दिल्ली पुलिस के लिए यह राहत की बात है कि प्रधानमंत्री की भतीजी का पर्स मारने वाले पकड़ लिए गए। होनी भी चाहिए, क्योंकि मामला हाईप्रोफाइल था। पुलिस ने झपटमारों को जल्द पकड़ लिया, इसके लिए दिल्ली पुलिस की प्रशंसा भी होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि अगर प्रधानमंत्री की भतीजी कोई और पीड़ित होता तो क्या पुलिस ऐसी फुर्ती दिखाती ! क्या दिन-रात लग कर लुटेरों को पकड़ने की जहमत उठाती ? सब जानते हैं एक ही जवाब होगा- नहीं।

तीन दिन पहले प्रधानमंत्री के बड़े भाई की बेटी से दिल्ली के सिविल लाइंस इलाके में स्कूटी सवार लुटेरों ने पर्स छीन लिया था और बाघ निकले थे। जिस जगह यह वारदात हुई वह इलाका भी कड़ी सुरक्षा वाला है। यहां दिल्ली के मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल रहते हैं। बड़े अफसरों के भी घर हैं। लेकिन कड़ी सुरक्षा वाले इलाकों में भी जिस तरह से लूटपाट की घटनाएं हो रही हैं, वह लुटेरों के दुस्साहस को बताती हैं। पुलिस का कोई खौफ नहीं है। पुलिस लुटेरों के आगे बेबस है तो क्यों, यह विचारणीय सवाल है।

दिल्ली में झपटमारी और लूटपाट की घटनाएं आम हैं। शायद ही कोई इलाका हो जहां चेन, पर्स और मोबाइल छीनने की घटनाएं सामने न आती हों। लेकिन फिर बी ताज्जुब इस बात का है कि दिल्ली को महिलाओं के लिए सुरक्षित बताने का दावा किया जाता रहा है। इस घटना ने पुलिस की मनोवृत्ति को एक बार फिर उजागर कर दिया है। अगर ऊपर से डंडा पड़े तो मामले का संज्ञान लो, मामला किसी ताकतवर आदमी का हो तो सुनवाई होगी। छीना-झपटी के रोजाना जितने मामले दर्ज होते हैं उनमें से कितने मामलों में पुलिस इस तरह की फुर्ती दिखाती है, यह बताने की जरूरत नहीं है। सवाल यह भी है कि अगर पुलिस सतर्क रहती है, सुरक्षा चाकचौबंद रहती है तो फिर लुटेरे बेखौफ क्यों हैं। इस घटना में एक चौंकाने वाली यह पता चली है कि स्कूटी सवार लुटेरे पैंतीस किलोमीटर तक बिना हेलमेट के घूमते रहे। जाहिर है, किसी ने न कहीं रोका, न कुछ पूछा। यों यातायात पुलिस जरा-जरा से मामलों में सख्ती दिखाती है, पर लुटेरों के लिए रियायत है। कहीं कोई बेरिकेड नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है? यह कोई छिपी बात नहीं है कि पुलिस को लुचेरों के तंत्र की चप्पा-चप्पा खबर रहती है। इसी तरह लुचेरे भी जानते हैं कि पुलिस कहां रहती है, कहां नहीं, कैसे काम करती है, किस पर हाथ डालती है, किस पर नहीं। पर लूटने वाला यह नहीं जानता कि जिसे वह लूटने जा रहा है, वह है कौन, कितना ताकतवर है। इसीलिए आम आदमी लुटता चला जाता है और पुलिस पर कोई असर नहीं होता।

इसमें कोई शक नहीं कि हमारी पुलिस व्यवस्था का तंत्र चरमरा चुका है। पुलिस सिर्फ सत्ता का हथियार बन कर रह गई है। यह भी सही है कि पुलिस के पास संसाधनों की भारी कमी है। लेकिन उससे ज्यादा उसमें आत्मबल की है। उसे काम करने की आजादी नहीं है। राजनीतिकों की सुरक्षा की ज्यादा चिंता है। जहां एक नेता की सुरक्षा में चार-पांच पुलिस वाले लगे रहते हैं, वहीं कई सौ लोगों पर एक सिपाही का अनुपात है। ऐसे में आम आदमी की सुनवाई कैसे करेगी पुलिस?

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