केजरीवाल मॉडल पर दिल्ली की मुहर

राजनीति के नरेंद्र मोदी मॉडल पर देश की मुहर लगी है और अरविंद केजरीवाल के मॉडल पर दिल्ली के लोगों ने मुहर लगा दी है। नरेंद्र मोदी का मॉडल दिल्ली में नहीं चला, केजरीवाल का मॉडल देश में चलेगा या नहीं, इस बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी है। पर इतना तय है कि इस मॉडल में लोगों की जिज्ञासा बढ़ गई है। जैसे नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल को लेकर पूरे देश में उत्सुकता थी और उसे प्रत्यक्ष देखने के लिए लोगों ने मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को वोट दिया, संभव है कि उसी किस्म की उत्सुकता अब केजरीवाल मॉडल को देखने की हो। पर इसका जवाब वक्त की गर्भ में है कि देश के लोग उस मॉडल को कैसे लेते हैं।

फिलहाल दिल्ली के लोगों ने केजरीवाल मॉडल को उतनी ही मजबूती से स्वीकार किया है, जितनी मजबूती से पिछली बार किया था। इस बार 2015 के मुकाबले सीटें जरूर चार कम हैं पर वोट उतने ही हैं, जितने पिछली बार मिले थे। फिर भी आंकड़ों की बजाय केजरीवाल की दिल्ली की कहानी अगर उनकी सरकार के कामकाज के नजरिए से देखें तो तस्वीर बेहतर ढंग से दिखाई देगी और समझ में भी आएगी। केजरीवाल ने नतीजों के बाद खुद कहा कि अब देश में एक नए राजनीतिक दौर की कहानी शुरू हुई है, जो ‘काम की राजनीति’ है।

केजरीवाल ने अपने काम पर वोट मांगा। चुनाव की घोषणा होते ही उन्होंने दिल्ली के लोगों से कहा कि अगर उनको लगता है कि सरकार ने उनके लिए काम किया है तो वे उनको वोट दें, अन्यथा नहीं दें। यह बहुत बड़ी बात थी, जिसको बारीकी से समझने की जरूरत है। केजरीवाल ने असल में काम का एक नया मॉडल दिया, जो अब तक सरकारों द्वारा बनाए गए मॉडल से अलग था।

उन्होंने दिल्ली के बुनियादी ढांचे का विस्तार करने की बजाय आम लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का मॉडल विकसित किया। इसके पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है। पर असली बात यह है कि दिल्ली के लोगों को यह मॉडल पसंद आया। असल में दिल्ली वह नहीं है, जो रायसीना की पहाड़ियों से दिखती है। दिल्ली का विस्तार उससे कहीं ज्यादा है।

दिल्ली में खुद केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 40 लाख लोग अनियमित कॉलोनियों में रहते हैं। लगभग इतने ही लोग दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी यानी जेजे कॉलोनियों में रहते हैं। केंद्र व राज्य सरकार के कर्मचारियों, बड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोगों और कारोबारियों को छोड़ दें तो दिल्ली की बड़ी आबादी रोजमर्रा के जीवन संघर्षों से जूझती रहती है। उनको विकास के पारंपरिक मॉडल से कोई लेना-देना नहीं होता है। उनकी पहली चिंता अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की होती है। केजरीवाल ने इसी बात को समझा और बुनियादी ढांचे की बजाय बुनियादी जरूरतों को पूरा करना शुरू किया।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके पांच साल के कामकाज में नए स्कूल-कॉलेज शायद नहीं बने हैं, नए अस्पताल भी शायद ही कहीं बने हैं, नए फ्लाईओवर और नई सड़कों का निर्माण नहीं हुआ है पर उन्होंने आम लोगों के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर किया है और उसे आसानी से, सस्ती दर पर या बिल्कुल मुफ्त में उपलब्ध कराया है। दिल्ली के घरों में पानी की मीटर लगवाने और साफ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ साथ उन्होंने इसे आम लोगों के  लिए बिल्कुल मुफ्त कर दिया। जिनको सप्लाई के पानी से गाड़ी की धुलाई नही करनी है, शॉवर व फ्लश नहीं इस्तेमाल करना है और वाशिंग मशीन नहीं चलानी है उनके लिए हर दिन सात सौ लीटर पानी बहुत होता है। केजरीवाल ने इतना पानी बिल्कुल मुफ्त में मुहैया कराया है। ऐसे परिवारों के लिए केजरीवाल ने दो सौ यूनिट बिजली मुफ्त मुहैया कराई।

दिल्ली की महिलाओं के लिए दिल्ली परिवहन निगम की बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी। यह भी बहुत बड़ी बात है। दिल्ली की कामकाज महिलाओं और छात्राओं का यातायात पर औसतन दो से तीन हजार रुपए खर्च होता है। केजरीवाल ने हर महीने उनके इतने रुपए बचाए। दिल्ली के स्कूलों और अस्पतालों की हालत उन्होंने बेहतर की। अस्पतालों में हर किस्म के पैथोलॉजिकल और रेडियोलॉजी के जांच मुफ्त कराए और तमाम बड़े ऑपरेशन भी मुफ्त में कराने की सुविधा दी। स्कूलों की इमारतों को बेहतर बनाया गया, शिक्षकों का निश्चित वेतन सुनिश्चित किया गया और निजी स्कूलों की तर्ज पर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और अभिभावकों की मीटिंग कराई गई। इससे शिक्षा की गुणवत्ता में गुणात्मक सुधार हुआ। केजरीवाल की सरकार ने मोहल्ला क्लीनिक की योजना को कायदे से लागू किया। घर बैठे दर्जनों सेवाएं उपलब्ध करानी शुरू की।

केजरीवाल ने जो किए वह सब छोटे छोटे काम थे पर इनका असर बहुत बड़ा होता है। जैसे बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने स्कूली लड़कियों के लिए पोशाक और साइकिल की योजना लागू की थी। यह कोई बहुत बड़े खर्च वाली कोई बड़ी महत्वाकांक्षी योजना नहीं थी पर इसने लोगों के दिल दिमाग पर बहुत बड़ा असर डाला था। कुछ ऐसा ही असर केजरीवाल की योजनाओं ने डाला। अपनी पार्टी के नाम के अनुरूप केजरीवाल ने आम लोगों को लक्ष्य किया, उनकी बेहतरी की योजनाएं बनाईं। उनका यह मॉडल बड़ी बड़ी बातों और बड़ी महत्वाकांक्षी योजनाओं से अलग था। उन्होंने पिछले चुनाव में काम के ऐसे वादे किए थे, जो सीधे आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं और जिन्हें वे पूरा कर सकते थे। अपने इस मॉडल को उन्होंने काम की राजनीति का मॉडल बताया है। इसे लेकर वे पूरे देश में भी जा सकते हैं। यह देखना दिलचस्प है कि वे कब इसे ‘राष्ट्र निर्माण का मॉडल’ बताते हुए आगे बढ़ते हैं।

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