घाव के नासूर में बदलने का इंतजार

दिल्ली में दंगे हो गए हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पहले भी दंगे होते रहे हैं पर उनकी तीव्रता बहुत कम रही है और दायरा भी बहुत सीमित होता है। कभी पुरानी दिल्ली यानी दीवारों से घिरे ‘शाहजहांनाबाद’ की गलियों में पथराव हो जाता है तो कभी सीलमपुर, जाफराबाद या जामिया के इलाकों में पत्थरबाजी हो जाती है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जिन इलाकों में अभी हिंसा हो रही है उन इलाकों में भी पहले कई बार तनाव हो चुका है पर वह वक्ती तनाव होता है। किसी मामूली बात पर झड़प होती है और फिर सारी चीजें सामान्य हो जाती हैं। पर इस बार दिल्ली में हो रहे सांप्रदायिक दंगों की तीव्रता भी बहुत है और दायरा भी बहुत बड़ा है। लगभग आधी दिल्ली का इलाका किसी न किसी तरह से इसकी चपेट में है। यमुना पार का उत्तर-पूर्वी दिल्ली का इलाका सीधे इसकी जद में है। दक्षिण दिल्ली के जिस शाहीन बाग इलाके में 73 दिन से लोग संशोधित नागरिकता कानून के विरोध में धरने पर बैठे हैं वहां दंगा तो नहीं हो रहा है पर तनाव किसी दंगे से कम नहीं है।

सवाल है कि क्या दिल्ली में सांप्रदायिक दंगा किसी तात्कालिक कारण से हुआ है या इसके पीछे कोई डिजाइन है? कहने को कहा जा रहा है कि इसका संबंध अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा से है। ट्रंप को सोमवार को अहमदाबाद पहुंचना था और उसी दिन रात में उनका दिल्ली पहुंचने का कार्यक्रम पहले से तय था। उनका यात्रा के मद्देनजर सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त किए गए थे और यह प्रयास भी हो रहा था कि किसी तरह की कोई घटना न हो ताकि अमेरिका या ट्रंप को भारत की धार्मिक स्वतंत्रता आदि का मुद्दा उठाने का मौका न मिले। यह भी ध्यान रखने की बात है कि ट्रंप के अमेरिका से रवाना होने से पहले ही यह खबर आ गई थी कि वे कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने और संशोधित नागरिकता कानून के बहाने भारत की धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा उठा सकते हैं। तभी दिल्ली के दंगों को इससे जोड़ कर देखा जा सकता है।

यह तथ्य है कि दंगों की शुरुआत अचानक शनिवार की रात को हुई। शनिवार को आधी रात के करीब जाफराबाद इलाके में बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं निकलीं और सड़क पर बैठ गईं। उन्होंने संशोधित नागरिकता कानून, सीएए के विरोध में नारेबाजी की और शाहीन बाग की तरह आंदोलन शुरू कर दिया। यह बिल्कुल नया आंदोलन था, जबकि इससे पहले कम से कम 15 जगहों पर सीएए के विरोध में आंदोलन चल रहे थे। तभी यह सवाल उठ रहा है कि शनिवार की आधी रात को अचानक यह प्रदर्शन शुरू करने की क्या जरूरत थी? एक तरफ सुप्रीम कोर्ट वार्ताकारों के जरिए शाहीन बाग की सड़क खाली कराने का प्रयास कर रही है और दूसरी ओर प्रदर्शनकारी दो दूसरी सड़कों पर जाम कर रहे थे। जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे धरने की वजह से उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दो मुख्य रास्ते प्रभावित हुए। इस बीच कुछ आम लोग और कुछ भाजपा के नेताओं ने सीएए के समर्थन में रैली निकाल दी, जिससे दोनों पक्षों के बीच पथराव शुरू हो गया और यह झड़प सांप्रदायिक दंगे में बदल गई।

सो, बिना हिचक कहा जा सकता है कि जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे शनिवार की रात को मुस्लिम महिलाओं का जमा होना और सीएए के विरोध में धरने पर बैठना एक योजना का हिस्सा था, जिसका मकसद ट्रंप और अमेरिकी प्रशासन का और इस बहाने दुनिया भर का ध्यान सीएए की ओर आकर्षित करना था। पर शायद उनको भी अंदाजा नहीं था कि इस पर ऐसी प्रतिक्रिया होगी और दंगा भड़क जाएगा। हालांकि इस तात्कालिक कारण के अलावा एक बड़ा कारण यह है कि केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने नागरिकता मामले पर चल रहे आंदोलन और धरने-प्रदर्शन को नासूर बनने दिया। जान बूझकर इस मामले का हल नहीं निकाला गया।

अगर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने 70 दिन पहले जब शाहीन बाग में लोगों ने धरना शुरू किया था तभी इसका हल निकालने का गंभीर प्रयास किया गया होता तो यह घाव नासूर में नहीं तब्दील होता। ध्यान रहे शाहीन बाग में धरने पर बैठे लोग पहले दिन से सरकार की ओर से किसी वार्ताकार का इंतजार कर रहे हैं। वे इस इंतजार में भी थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जो बातें चुनावी सभाओं में कह रहे हैं वहीं बात उनका कोई प्रतिनिधि शाहीन बाग आकर कहे। ध्यान रहे मोदी और शाह दोनों ने कई बार कहा कि अभी केंद्र सरकार का राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, एनआरसी लाने का कोई इरादा नहीं है और इस बारे में कोई चर्चा नहीं हुई है।

यह कहने के साथ ही सरकार इस बात पर अड़ी रही कि वह सीएए में कोई बदलाव नहीं करने जा रही है। साथ ही राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर, एनपीआर में माता-पिता के जन्मस्थान और उनकी जन्मतिथि की जानकारी मांगी गई। सो, सीएए, एनपीआर और एनआरसी को लेकर कई तरह का कंफ्यूजन हो गया। इसका नतीजा यह निकला कि देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय में आशंका भर गई। उनको दोयम दर्जे का नागरिक होने का भय सताने लगा और इस भय ने तीव्र प्रतिरोध को जन्म दिया। सरकार ने अपनी ओर से पहल कर इस प्रतिरोध को खत्म करने का कोई प्रयास नहीं किया। अगर सरकार लोगों तक पहुंचने का प्रयास करती है तो संभव था कि मामले को हल पहले ही निकाला जा चुका होता। पर ऐसा नहीं हुआ और नतीजा यह है कि राष्ट्रीय राजधानी हिंसा में जल रही है। अब भी बहुत देर नहीं हुई है। सरकार पहल करे और देश भर में चल रहे सीएए विरोधी आंदोलनों को खत्म कराए नहीं तो दिल्ली जैसा हाल पूरे देश में होगा।

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